वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 260, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १५] अध्याय २ २५७ ही उन आकाशादि तत्त्वोंका अधिष्ठाता है, तब तो प्रत्येक शरीरका अधिष्ठाता भी वही होगा। जीवात्माको शरीरका अधिष्ठाता मानना भी उचित नहीं होगा, इसपर कहते हैं— प्राणवता शब्दात्॥ २।४।१५॥ प्राणवता=(ब्रह्मने) प्राणधारी जीवात्माके सहित (प्रवेश किया); शब्दात्=ऐसा श्रुतिका कथन होनेसे यह दोष नहीं है। व्याख्या—श्रुतिमें यह भी वर्णन आया है कि इन तीनों तत्त्वोंको उत्पन्न करनेके बाद उस परमदेवने विचार किया, 'अब मैं इस जीवात्माके सहित इन तीनों देवताओंमें प्रविष्ट होकर नाना नाम-रूपोंको प्रकट करूँ।'१ (छा० उ० ६।३।२) इस कथनसे यह सिद्ध होता है कि जीवात्माके सहित परमात्माने उन तत्त्वोंमें प्रविष्ट होकर जगत्का विस्तार किया। इसी प्रकार ऐतरेयोपनिषद्के पहले अध्यायमें जगत्की उत्पत्तिका वर्णन करते हुए तीसरे खण्डमें यह बताया गया है कि जीवात्माको सहयोग देनेके लिये जगत्कर्ता परमेश्वरने सजीव शरीरमें प्रवेश किया। तथा मुण्डक और श्वेताश्वतरमें ईश्वर और जीवको दो पक्षियोंकी भाँति एक ही शरीररूप वृक्षपर स्थित बताया गया है।२ इसी प्रकार कठोपनिषद्में भी परमात्मा और जीवात्माको हृदयरूप गुहामें स्थित कहा गया है।३ इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा और परमेश्वर—इन दोनोंका प्रत्येक शरीरमें साथ-साथ रहना सिद्ध होता है। इसलिये जीवात्माको शरीरका अधिष्ठाता माननेमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—श्रुतिमें तत्त्वोंकी उत्पत्तिके पहले या पीछे भी जीवात्माकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं आया, फिर उस परमेश्वरने सहसा यह विचार कैसे कर लिया कि 'इस जीवात्माके सहित मैं इन तत्त्वोंमें प्रवेश करूँ?' ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— १-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आ गया है। २-यह मन्त्र सूत्र १।३।७ की व्याख्यामें आ गया है। ३-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आ गया है।