वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें२५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ तस्य च नित्यत्वात् ॥ २ । ४ । १६ ॥ तस्य = उस जीवात्माकी; नित्यत्वात् = नित्यता प्रसिद्ध होनेके कारण; च = भी (उसकी उत्पत्तिका वर्णन करना उचित ही है) । व्याख्या—जीवात्माको नित्य माना गया है। सृष्टिके समय शरीरकी उत्पत्तिके साथ-साथ गौणरूपसे ही उसकी उत्पत्ति बतायी गयी है (सू० २।३।१६), वास्तवमें उसकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी है। (सू० २।३।१७) इसलिये पंचभूतोंकी उत्पत्तिके पहले या बाद उसकी उत्पत्ति न बतलाकर जो जीवात्माके सहित परमेश्वरका शरीरमें प्रविष्ट होना कहा गया है, वह उचित ही है। उसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—श्रुतिमें प्राणके नामसे इन्द्रियोंका वर्णन आया है, इससे यह जान पड़ता है कि इन्द्रियाँ मुख्य प्राणके ही कार्य हैं, उसीकी वृत्तियाँ हैं, भिन्न तत्त्व नहीं है। अथवा यह अनुमान होता है कि चक्षु आदिकी भाँति मुख्य प्राण भी एक इन्द्रिय है, उन्हींकी जातिका पदार्थ है। ऐसी दशामें वास्तविक बात क्या है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥ २ । ४ । १७ ॥ ते = वे मन आदि ग्यारह; इन्द्रियाणि = इन्द्रिय; श्रेष्ठात् = मुख्य प्राणसे भिन्न हैं; अन्यत्र तद्व्यपदेशात् = क्योंकि दूसरी श्रुतियोंसे उसका भिन्नतासे वर्णन है। व्याख्या—दूसरी श्रुतियोंमें मुख्य प्राणकी गणना इन्द्रियोंसे अलग की गयी है तथा इन्द्रियोंको प्राणोंके नामसे नहीं कहा गया है। (मु० उ० २।१।३)* इसलिये पूर्वोक्त चक्षु आदि दसों इन्द्रियाँ और मन मुख्य प्राणसे सर्वथा भिन्न पदार्थ हैं। न तो वे मुख्य प्राणके कार्य हैं, न मुख्य प्राण उनकी भाँति इन्द्रियोंकी गणनामें हैं। इन सबकी शरीरमें स्थिति मुख्य प्राणके अधीन है, इसलिये गौणरूपसे श्रुतिमें इन्द्रियोंको प्राणके नामसे कहा गया है।
- देखें सूत्र २।३।१५ की टिप्पणी।