वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ होनेसे उनके लिये अनुज्ञा और निषेधका भेद अनुचित नहीं है। जैसे, श्मशानकी अग्निको त्याज्य और यज्ञकी अग्निको ग्राह्य बताया जाता है तथा जैसे शूद्रको सेवा करनेके लिये आज्ञा दी है और ब्राह्मणके लिये सेवा-वृत्तिका निषेध किया गया है; इसी प्रकार सभी जगह समझ लेना चाहिये। शरीरोंके सम्बन्धसे यथायोग्य भिन्न-भिन्न प्रकारका विधि-निषेधरूप आदेश उचित ही है, इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकारसे विधि-निषेधकी व्यवस्था होनेपर भी जीवात्माओंको विभु माननेसे उनका और कर्मोंका अलग-अलग विभाग कैसे होगा? इसपर कहते हैं— असंततेश्चाव्यतिकरः ॥ २ । ३ । ४९ ॥ च=इसके सिवा; असंततेः=(शरीरोंके आवरणसे) व्यापकताका निरोध होनेके कारण; अव्यतिकरः=उनका तथा उनके कर्मोंका मिश्रण नहीं होगा। व्याख्या—जिस प्रकार कारणशरीरका आवरण होनेसे सब जीवात्मा विभु होते हुए भी प्रलयकालमें एक नहीं हो जाते, उनका विभाग विद्यमान रहता है (ब्र० सू० २।३।३०) वैसे ही सृष्टिकालमें शरीरोंके सम्बन्धसे सब जीवोंकी परस्पर व्याप्ति न होनेके कारण उनके कर्मोंका मिश्रण नहीं होता, विभाग बना रहता है; क्योंकि शरीर, अन्तःकरण और अनादि कर्मसंस्कार आदिके सम्बन्धसे उनकी व्यापकता परमेश्वरकी भाँति नहीं है, किंतु सीमित है। अतएव जिस प्रकार शब्दमात्रकी आकाशमें व्याप्ति होते हुए भी प्रत्येक शब्दका परस्पर मिश्रण नहीं होता, उनकी भिन्नता बनी रहती है तभी तो एक ही कालमें भिन्न-भिन्न देशोंमें बोले हुए शब्दोंको भिन्न-भिन्न स्थानोंमें भिन्न-भिन्न मनुष्य रेडियोद्वारा अलग-अलग सुन सकते हैं, इसमें कोई अड़चन नहीं आती। उन शब्दोंका विभुत्व और अमिश्रण दोनों रह सकते हैं, वैसे ही आत्माओंका भी विभुत्व उनके अमिश्रणमें बाधक नहीं है; क्योंकि आत्मतत्त्व तो शब्दकी अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म है, उसके विभु होते हुए परस्पर मिश्रण न होनेमें तो कहना ही क्या है!