वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ४७-४८ ] अध्याय २ २४३ स्मरन्ति च ॥ २ । ३ । ४७ ॥ स्मरन्ति = यही बात स्मृतिकार कहते हैं; च = और ( श्रुतिमें भी कही गयी है।) व्याख्या — श्रीमद्भगवद्गीतादिमें भी ऐसा ही वर्णन मिलता है— अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ 'अर्जुन ! यह अविनाशी परमात्मा अनादि और गुणातीत होनेके कारण शरीरमें स्थित हुआ भी न तो स्वयं कर्ता है और न सुख-दुःखादि फलोंसे लिप्त ही होता है।' (गीता १३।३१) इसी प्रकार दूसरी जगह भी कहा है कि उन दोनोंमें जो परमात्मा नित्य और निर्गुण कहा गया है, वह जिस प्रकार कमलका पत्ता जलमें रहता हुआ जलसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही वह जीवके कर्मफलोंसे लिप्त नहीं होता।' (महाभारत, शान्तिपर्व ३५१ । १४-१५) इसी प्रकार श्रुतिमें भी कहा है कि 'उन दोनोंमेंसे एक जीवात्मा तो पीपलके फलोंको अर्थात् कर्मफलरूप सुख-दुःखोंको भोगता है और परमेश्वर न भोगता हुआ देखता रहता है।'* (मु० उ० ३ । १ । १) इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमात्मा किसी प्रकारके दोषोंसे लिप्त नहीं होता। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'जब सभी जीव एक ही परमेश्वरके अंश हैं तब किसी एकके लिये जिस कामको करनेकी आज्ञा दी जाती है, दूसरेके लिये उसीका निषेध क्यों किया जाता है? शास्त्रमें जीवोंके लिये भिन्न-भिन्न आदेश दिये जानेका क्या कारण है?' इसपर कहते हैं— अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरादिवत् ॥ २ । ३ । ४८ ॥ अनुज्ञापरिहारौ =विधि और निषेध; ज्योतिरादिवत् =ज्योति आदिकी भाँति; देहसम्बन्धात्=शरीरोंके सम्बन्धसे हैं। व्याख्या — भिन्न-भिन्न प्रकारके शरीरोंके साथ जीवात्माओंका सम्बन्ध
- यह मन्त्र सूत्र १।३।७ की व्याख्यामें आया है।