वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २१ ) सूत्र विषय पृष्ठ १९-२० रात्रि और दक्षिणायनकालमें भी सूर्यरश्मियोंसे उसका बाधारहित सम्बन्ध .............................................. ४३७-४३८ २१ योगीके लिये गीतोक्त कालविशेषका नियम ................ ४३८-४३९ तीसरा पाद १ ब्रह्मलोकमें जानेके लिये 'अर्चिरादि' एक ही मार्गका कथन .............................................................. ४४०-४४१ २ संवत्सरसे ऊपर और सूर्यलोकके नीचे वायुलोककी स्थिति.. ४४१-४४२ ३ 'विद्युत्' से ऊपर वरुणलोककी स्थिति ......................... ४४२ ४ 'अर्चिः', 'अहः', 'पक्ष', 'मास', 'अयन' आदि आतिवाहिक पुरुष हैं, इसका प्रतिपादन .................................... ४४३ ५ अर्चि आदिको अचेतन माननेमें आपत्ति ..................... ४४३-४४४ ६ विद्युल्लोकसे ऊपर ब्रह्मलोकतक अमानव पुरुषके साथ जीवात्माका गमन ................................................ ४४४ ७-११ 'ब्रह्मलोकमें कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है', इस बादरिके मतका वर्णन ..................................................... ४४५-४४७ १२-१४ 'ब्रह्मलोकमें परब्रह्मकी प्राप्ति होती है' इस जैमिनिमतका उपपादन ............................................................ ४४७-४४९ १५-१६ प्रतीकोपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सभी उपासक ब्रह्मलोकमें जाकर संकल्पानुसार कार्यब्रह्म अथवा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं, यह बादरायणका सिद्धान्त .... ४४९-४५१ चौथा पाद १-३ परब्रह्मपरायण जीवके लिये परमधाममें पहुँचकर अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न होने एवं सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मरूपसे स्थित होनेका कथन ४५२-४५४ ४-६ ब्रह्मलोकमें पहुँचनेवाले उपासकोंकी तीन गति— (१) अभिन्नरूपसे ब्रह्ममें मिल जानेका, (२) पृथक् रहकर परमात्माके सदृश दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होनेका