वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २२ ) सूत्र विषय पृष्ठ तथा (३) केवल चैतन्यमात्र स्वरूपसे स्थित होनेका वर्णन ............................................................. ४५४-४५६ ७ उपासकके भावानुसार तीनों ही स्थितियोंको माननेमें कोई विरोध नहीं है, यह बादरायणका सिद्धान्त ........... ४५६ ८-९ प्रजापति ब्रह्माके लोकमें जानेवाले उपासकोंको संकल्पसे ही वहाँके भोगोंकी प्राप्ति ........................ ४५७ १० उन उपासकोंके शरीर नहीं होते; यह बादरिका मत .... ४५७-४५८ ११ 'उन्हें शरीरकी प्राप्ति होती है' यह जैमिनिका मत ...... ४५८ १२ संकल्पानुसार उनके शरीरका होना और न होना दोनों ही बातें सम्भव हैं—यह बादरायणका सिद्धान्त ............. ४५८-४५९ १३-१४ वे बिना शरीरके स्वप्नकी भाँति और शरीर धारण करके जाग्रत्की भाँति भोगोंका उपभोग करते हैं, यह कथन .... ४५९ १५-१६ सुषुप्ति-प्रलय एवं ब्रह्मसायुज्यकी प्राप्तिके प्रसंगमें ही नामरूपके अभावका कथन ................................. ४६०-४६१ १७-१८ ब्रह्मलोकमें गये हुए उपासक वहाँके भोग भोगनेके उद्देश्यसे अपने लिये इच्छानुसार शरीर-निर्माण कर सकते हैं, संसारकी रचना नहीं, इसका प्रतिपादन ...... ४६१-४६२ १९-२० ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माको निर्विकार ब्रह्मरूप फलकी प्राप्तिका कथन .................................... ४६३-४६४ २१ निर्लिप्तभावसे भोगमात्रमें उसे ब्रह्माकी समता प्राप्त होती है, सृष्टिरचनामें नहीं ................................. ४६४-४६५ २२ ब्रह्मलोकसे पुनरावृत्ति नहीं होती, इसका प्रतिपादन ४६५ सूत्रोंकी वर्णानुक्रम-सूची ४६६-४७८