भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 486 में से

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चाहिये; क्योंकि यह कथन भी पहलेके सदृश ही है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उन धान, जौ आदिमें अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये जो दूसरे जीव पहलेसे ही स्थित हैं उनके रहते हुए ही यह चन्द्रलोकसे लौटनेवाला जीवात्मा उनके साथ-साथ पुरुषके उदरमें चला जाता है; धान, जौ आदि स्थावरयोनियोंको प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध- इसपर शंका उपस्थित करके ग्रन्थकार उसका निराकरण करते हैं- अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥ ३ । १ । २५ ॥ चेत् = यदि कहा जाय कि; अशुद्धम् = यह तो अशुद्ध (पाप) कर्म होगा; इति न = तो ऐसी बात नहीं है; शब्दात् = श्रुतिके वचनसे इसकी निर्दोषता सिद्ध होती है। व्याख्या-यदि यह शंका की जाय कि 'अनाजके प्रत्येक दानेमें जीव रहता है, इस मान्यताके अनुसार अन्नको पीसना, पकाना और खाना तो बड़ा अशुद्ध (पाप) कर्म होगा, क्योंकि उसमें तो अनेक जीवोंकी हिंसा करनेपर एक जीवकी उदरपूर्ति होगी' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि इस प्रकरणमें पुरुषको 'अग्नि' बताकर उसमें अन्नको हवन करना बताया है तथा श्रुतिमें जगह-जगह अन्नके खाये जानेका वर्णन है। (छा० उ० ६।६।२) अतः श्रुतिका विधान होनेके कारण उसमें हिंसा नहीं होती तथा उन जीवोंकी उस कालमें सुषुप्ति-अवस्था रहती है, जब वे पृथिवी और जलके सम्बन्धसे अंकुरित होते हैं, तब उनमें चेतना आती है और सुख-दुःखका ज्ञान होता है, पहले नहीं। अतः अन्नभक्षणमें हिंसा नहीं है। सम्बन्ध-अन्नसे संयुक्त होनेके बाद वह किस प्रकार कर्मफलभोगके लिये शरीर धारण करता है, उसका क्रम बतलाते हैं- रेतःसिग्योगोऽथ ॥ ३ । १ । २६ ॥ अथ = उसके बाद; रेतःसिग्योगः = वीर्यका सेचन करनेवाले पुरुषके साथ उसका सम्बन्ध होता है।

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