वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २७ ] अध्याय ३ २८१ व्याख्या—उसके अनन्तर वह जीवात्मा अन्नके साथ पुरुषके पेटमें जाकर उसके वीर्यमें प्रविष्ट हो उस पुरुषसे संयुक्त होता है, इस कथनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि आकाश आदिसे लेकर अन्नतक सभी जगह केवल संयोगसे ही उसका तदाकार होना कहा है; स्वरूपसे नहीं। सम्बन्ध—उसके बाद— योनेः शरीरम् ॥ ३ । १ । २७ ॥ योनेः=स्त्रीकी योनिमें प्रविष्ट होनेके अनन्तर; शरीरम्=वह जीवात्मा कर्मफलभोगके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। व्याख्या—इस प्रकार वह स्वर्गसे आनेवाला जीवात्मा पहले पुरुषके वीर्यके आश्रित होता है। फिर उस पुरुषद्वारा गर्भाधानके समय स्त्रीकी योनिमें वीर्यके साथ प्रविष्ट करा दिया जाता है। वहाँ गर्भाशयसे सम्बन्ध होकर उक्त जीव अपने कर्मफलोंके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है। यहींसे उसके कर्मोंके फलका भोग आरम्भ होता है। इसके पहले स्वर्गसे उतरकर वीर्यमें प्रविष्ट होनेतक उसका कोई जन्म या शरीर धारण करना नहीं है, केवल उन-उन आकाश आदिके आश्रित रहना मात्र कहा गया है; उन धान आदि शरीरोंके अधिष्ठाता जीव दूसरे ही हैं। पहला पाद सम्पूर्ण