भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—वेदमें जिस प्रकार ब्रह्मके सत्य, ज्ञान और अनन्त (तै० उ० २।१) आदि लक्षण बताये गये हैं, उसी प्रकार उसको जगत्‌का कारण भी बताया गया है।१ इसलिये पूर्वसूत्रके कथनानुसार परब्रह्म परमेश्वरको जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण मानना सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध—मृत्तिका आदि उपादानोंसे घट आदि वस्तुओंकी रचना करनेवाले कुम्भकार आदिकी भाँति ब्रह्मको जगत्‌का निमित्त कारण बतलाना तो युक्तिसंगत हैं; परंतु उसे उपादान कारण कैसे माना जा सकता है? इसपर कहते हैं— तत्तु समन्वयात् ॥१।१।४॥ तु=तथा; तत्=वह ब्रह्म; समन्वयात्=समस्त जगत्‌में पूर्णरूपसे अनुगत (व्याप्त) होनेके कारण (उपादान भी हैं)। व्याख्या—जिस प्रकार अनुमान और शास्त्र-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगत्‌का निमित्त कारण परब्रह्म परमेश्वर है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है कि वही इसका उपादान कारण भी है; क्योंकि वह इस जगत्‌में पूर्णतया अनुगत (व्याप्त) है, इसका अणुमात्र भी परमेश्वरसे शून्य नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी भगवान्‌ने कहा है कि 'चर या अचर, जड या चेतन, ऐसा कोई भी प्राणी या भूतसमुदाय नहीं है, जो मुझसे रहित हो।' (१०। ३९) 'यह सम्पूर्ण जगत् मुझसे व्याप्त है।' (गीता ९। ४) उपनिषदोंमें भी स्थान-स्थानपर यह बात दोहरायी गयी है कि 'उस परब्रह्म परमेश्वरसे यह समस्त जगत् व्याप्त है।'२ सम्बन्ध—सांख्यमतके अनुसार त्रिगुणात्मिका प्रकृति भी समस्त जगत्‌में १-'एष योनिः सर्वस्य' (मा० उ० ६) 'यह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्‌का कारण है।' 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति।' (तै० उ० ३।१) 'ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा अन्तमें प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको जाननेकी इच्छा कर, वही ब्रह्म है।' २-ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। (ईशा० १)