वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ५-६ ] अध्याय १ २७ व्याप्त है, फिर व्याप्तिरूप हेतुसे जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको ही क्यों मानना चाहिये, प्रकृतिको क्यों नहीं ? इसपर कहते हैं— ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥ १।१।५॥ ईक्षतेः=श्रुतिमें 'ईक्ष' धातुका प्रयोग होनेके कारण; अशब्दम् = शब्द-प्रमाण-शून्य प्रधान (त्रिगुणात्मिका जड प्रकृति); न = जगत्का कारण नहीं है। व्याख्या—उपनिषदोंमें जहाँ सृष्टिका प्रसंग आया है, वहाँ 'ईक्ष' धातुकी क्रियाका प्रयोग हुआ है; जैसे 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६।२।१) इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' (छा० उ० ६।२।३) अर्थात् 'उस सत्ने ईक्षण-संकल्प किया कि मैं बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ।' ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीत्' इस प्रकार आरम्भ करके 'स ईक्षत लोकान्नु सृजै' (ऐ० उ० १।१।१) अर्थात् 'उसने ईक्षण— विचार किया कि निश्चय ही मैं लोकोंकी रचना करूँ।' ऐसा कहा है। परंतु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड है, उसमें ईक्षण या संकल्प नहीं बन सकता; क्योंकि वह (ईक्षण) चेतनका धर्म है; अतः शब्दप्रमाणरहित प्रधान (जड प्रकृति)-को जगत्का उपादान कारण नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—ईक्षण या संकल्प चेतनका धर्म होनेपर भी गौणीवृत्तिसे अचेतनके लिये प्रयोगमें लाया जा सकता है, जैसे लोकमें कहते हैं 'अमुक मकान अब गिरना ही चाहता है।' इसी प्रकार यहाँ भी ईक्षण-क्रियाका सम्बन्ध गौणरूपसे त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिके साथ मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ॥१।१।६॥ चेत् =यदि कहो; गौणः = ईक्षणका प्रयोग गौणवृत्तिसे (प्रकृतिके लिये) हुआ है, न = तो यह ठीक नहीं है; आत्मशब्दात् = क्योंकि वहाँ 'आत्म' शब्दका प्रयोग है।