वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 292, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ९ ] अध्याय ३ २८९ लय होनेका स्थान भी वही है, यह अपने-आप सिद्ध हो जाता है। यह जगना उस परमात्माकी ही व्यवस्थासे होता है। जितने समयतक उसके प्रारब्धानुसार सुषुप्तिका सुखभोग होना चाहिये, उतना समय पूरा हो जानेपर उस परमेश्वरकी व्यवस्थासे जीवात्मा जाग्रत् हो जाता है; यह भाव भी यहाँ समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जो जीवात्मा सुषुप्ति-अवस्थामें विलीन होता है, वह जगकर वापस आता है या शरीरके किसी अंगमें पड़ा हुआ दूसरा ही कोई जीव जगता है? इसपर कहते हैं— स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥ ३।२।९॥ तु=निःसंदेह; स एव=वही जगता है; कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः=क्योंकि कर्म, अनुस्मृति, वेदप्रमाण और कर्म करनेकी आज्ञा इन सबकी सिद्धि तभी होगी, इसलिये यही मानना ठीक है। व्याख्या—जो जीवात्मा सोता है, वही जगता है। सोता दूसरा है और जगता दूसरा है, ऐसा माननेमें बहुत दोष आते हैं। अतः वैसा नहीं माना जा सकता; क्योंकि यह देखा जाता है कि मनुष्य पहले दिन जिस कर्मको आरम्भ करता है, उसके शेष भागकी पूर्ति दूसरे-तीसरे दिनोंतक करता रहता है। आधा काम दूसरेने किया हो और शेष आधे कामको अपना ही छोड़ा हुआ समझकर उसकी पूर्ति दूसरा करे यह सम्भव नहीं है तथा जगनेके बाद पहलेकी सब बातोंकी स्मृतिके साथ-साथ यह भी स्मरण अपने-आप होता ही है कि जो अबतक सोता था, वही मैं अब जगा हूँ। दूसरे जीवात्माकी कल्पना करनेसे किसी प्रकार भी इसकी संगति नहीं हो सकती; एवं श्रुतिमें भी जगह-जगह जो सोता है, उसीके जगनेकी बात कही गयी है (बृह० उ० ४।३।१६)। और कर्म करनेकी जो वेदोंमें आज्ञा दी गयी है, उसकी सफलता भी जो सोता है, उसीके जगनेसे होगी; क्योंकि एकको दी हुई आज्ञाका दूसरा कैसे पालन कर सकेगा। इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि जो जीवात्मा सुषुप्तिकालमें विलीन होता है, वही जगता है।