वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—जब मनुष्य किसी औषध आदिसे मूर्च्छित कर दिया जाता है अथवा अन्य किन्हीं बीमारी आदि कारणोंसे अचेत हो जाता है, उस समय भी न तो बाहरी जगत्का ज्ञान रहता है, न स्वप्न देखता है और न सुखका ही अनुभव करता है, वह कौन-सी अवस्था है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— मुग्धेऽर्द्धसम्पत्तिः परिशेषात् ॥ ३ । २ । १० ॥ मुग्धे = मूर्च्छाकालमें; अर्द्धसम्पत्तिः = अधूरी सुषुप्ति-अवस्था माननी चाहिये; परिशेषात् = क्योंकि यही अवस्था शेष रहती है; अन्य कोई अवस्था शेष नहीं है। व्याख्या—जन्मके बाद मरनेसे पहले जीवकी पूर्वोक्त तीन अवस्थाएँ ही प्रसिद्ध हैं। किसी विशेष कारणसे कभी-कभी हो जानेवाली यह मुग्धावस्था सबकी और सदैव नहीं होती, अतः इसके लक्षण कुछ-कुछ सुषुप्तिमें ही संगत हो सकते हैं। इसलिये इसे अधूरी सुषुप्ति मानना ही उचित है; क्योंकि उस अवस्थामें सुषुप्तिका सुखलाभ नहीं होता, केवल अज्ञानमात्रमें ही सुषुप्तिसे इसकी समता है; अतः इसे पूर्णतया सुषुप्ति भी नहीं कहा जा सकता। सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें जीवात्माकी जाग्रत् आदि अवस्थाओंका निरूपण किया गया है। उसमें प्रसंगवश यह बात भी कही गयी कि उस परब्रह्म परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन करनेपर यह जीव कर्मबन्धनसे मुक्त हो सकता है। जिसके ध्यानका यह महान् फल बताया गया है, उस परब्रह्म परमात्माका क्या स्वरूप है? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि श्रुतियोंमें कहीं तो उस परमेश्वरको सर्वथा निर्विशेष निर्गुण बताया गया है (क० उ० १ । ३ । १५, मा० उ० ७)। कहीं उसको सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सर्वसाक्षी तथा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण कहा गया है। (मा० उ० ६) कहीं उसे सर्वव्यापी और कहीं अंगुष्ठमात्र बताया गया है। कहीं क्रियाशील और कहीं अक्रिय कहा गया है; अतः उसका वास्तविक स्वरूप क्या है? तथा