वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहकर भी वह परमात्मा उन-उन वस्तुओं और स्थानोंके दोषोंसे लिप्त नहीं होता। उसमें परस्परविरोधी लक्षण एक साथ रह सकते हैं; क्योंकि वह सर्वशक्तिमान् और सांसारिक पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है।* लौकिक वस्तुओंके साथ तुलना करके उसका स्वरूप समझाया नहीं जा सकता; क्योंकि वह मन, वाणीका विषय नहीं है। अतः वेदने उसको दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त बताकर उसकी अपार महिमाको लक्ष्य कराया है। सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे शंका उपस्थित करके उसका निराकरण करते हुए पूर्वोक्त बातको दृढ़ करते हैं- न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ॥ ३ । २ । १२ ॥ चेत् = यदि कहो कि; भेदात् = सगुण (अपरब्रह्म या कार्यब्रह्म) और निर्गुण (परब्रह्म) ये ब्रह्मके पृथक्-पृथक् दो स्वरूप माने गये हैं, इसलिये; (वह एक ही परमात्मा दोनों लक्षणोंवाला) न=नहीं हो सकता; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; प्रत्येकम् अतद्वचनात् = क्योंकि प्रत्येक श्रुतिमें इसके विपरीत एक परब्रह्म परमेश्वरको ही दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला बताया गया है। व्याख्या - यदि कहा जाय कि 'जहाँ परमात्माको सब श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न बताया गया है, वहाँ मायाविशिष्ट कार्यब्रह्म या अपरब्रह्मका वर्णन है तथा जहाँ उसके निर्विशेष स्वरूपका प्रतिपादन हुआ है, वही परब्रह्मका वर्णन है, इस प्रकार दोनोंका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण दोनों लक्षण एकके नहीं हैं, अतः उस परब्रह्म परमात्माको उभयलिंगवाला मानना ठीक नहीं है।' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि अन्तर्यामिब्राह्मणमें पृथिवीसे लेकर जीवात्मापर्यन्त सबका अन्तर्यामी और अमृत एक ही परब्रह्म परमात्माको बताया गया है (बृह० उ० ३ । ७ । ३ से २२ तक) तथा माण्डूक्योपनिषद्में भी एक ही परब्रह्म परमात्माका वर्णन करते हुए उसे समस्त दिव्य गुणोंसे
- देखें सूत्र १ । १ । २ की व्याख्या और टिप्पणी।