भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र १३ ] अध्याय ३ २९३ सम्पन्न (मा० उ० ६) और सर्वथा निर्विशेष (मा० उ० ७) कहा गया है।* श्वेताश्वतरोपनिषद् (३।१, २)-में उस एक ही ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसे सूर्यके समान स्वयंप्रकाश और मायासे सर्वथा अतीत बताया गया है, फिर 'उससे श्रेष्ठ, महान् तथा सूक्ष्म दूसरा कोई नहीं है' ऐसा कहकर उसे सर्वत्र परिपूर्ण बताया है (श्वे० उ० ३।८, ९)। आगे चलकर उसीको आकार और दोषोंसे रहित कहा है (श्वे० उ० ३।१०)। फिर उसके सभी जगह मुख, सिर आदि अंग बताये गये हैं (श्वे० उ० ३।११) तथा उसे सबपर शासन करनेवाला, महान्, सबका प्रेरक, ज्ञानस्वरूप और निर्मल बताया है (श्वे० उ० ३।१२)। तदनन्तर उस परमेश्वरको जगत्स्वरूप, सब जगह हाथ-पैर आदि अंगोंवाला, सब इन्द्रियोंसे युक्त और समस्त इन्द्रियोंसे रहित, सबका स्वामी, शासक और आश्रय बताया है।' (३।१५-१७) इस प्रकार वहाँ प्रत्येक श्रुति-वाक्यमें एक परब्रह्म परमेश्वरको दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त कहा गया है। उससे भिन्न अपर (कार्य) ब्रह्मका वहाँ वर्णन नहीं है; इसलिये पर और अपर ब्रह्म भिन्न-भिन्न हैं-यह कहना ठीक नहीं है। अतएव यही सिद्ध हुआ कि वह परब्रह्म परमात्मा ही निर्गुण-निराकार है और वही सगुण-साकार भी है। इन दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होना उसका स्वभाव ही है; किसी उपाधिके कारण या कार्य-कारण-भेदसे नहीं। सम्बन्ध-दूसरी श्रुतिके प्रमाणसे पुनः उसके एकत्वको दृढ़ करते हैं- अपि चैवमेके ॥ ३।२।१३॥ अपि च = इसके सिवा; एके = किसी एक शाखावाले (विशेषरूपसे), एवम् = इस प्रकार प्रतिपादन करते हैं। व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद्में उस परब्रह्म परमेश्वरको सत्य, ज्ञान और अनन्त बतलाकर उसीसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतायी है (तै० उ० २।१)

  • ये दोनों मन्त्र-सूत्र १।१।२ की टिप्पणीमें आ गये हैं।