भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 418

सूत्र ८-९ ] अध्याय ४ ४१५ अर्थात् 'आसनपर बैठकर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे' (गीता ६। १२)। सम्बन्ध — उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— ध्यानाच्च ॥ ४ । १ । ८ ॥ ध्यानात् = उपासनाका स्वरूप ध्यान है, इसलिये; च = भी (यही सिद्ध होता है कि बैठकर उपासना करनी चाहिये) । व्याख्या — अपने इष्टदेवका ध्यान ही उपासनाका स्वरूप है (मु० उ० ३। १। ८) और चित्तकी एकाग्रताका नाम ध्यान है। अतएव यह बैठकर ही किया जा सकता है; चलते-फिरते या सोकर नहीं किया जा सकता। सम्बन्ध — पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ४।१।९॥ च=तथा श्रुतिमें; अचलत्वम्=शरीरकी निश्चलताको; अपेक्ष्य=आवश्यक बताकर ध्यान करनेका उपदेश किया गया है। व्याख्या — श्रुतिमें कहा है कि— त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ 'ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये ध्यानका अभ्यास करनेवालेको चाहिये कि सिर, ग्रीवा और छाती—इन तीनोंको उठाये हुए, शरीरको सीधा और स्थिर करके समस्त इन्द्रियोंको मनके द्वारा हृदयमें निरुद्ध करके ॐकाररूप नौकाद्वारा समस्त भयदायक जन्मान्तररूप स्रोतोंसे तर जाय' (श्वेता० उ० २।८)। इस श्रुतिसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उपासनाके लिये शरीरकी भी अचलता आवश्यक है, इसलिये भी उपासना बैठकर ही की जानी चाहिये। सम्बन्ध — उस बातको स्मृतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं—