वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें४१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ स्मरन्ति च ॥ ४ । १ । १० ॥ च=तथा; स्मरन्ति=ऐसा ही स्मरण करते हैं। व्याख्या-स्मृतिमें भी यही बात कही गयी है- समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥ 'काया, सिर और ग्रीवाको सम और अचल धारण किये हुए स्थिर होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि लगाकर, अन्य दिशाओंको न देखता हुआ निर्भय होकर, भलीभाँति विक्षेपरहित, शान्तचित्त एवं ब्रह्मचर्य- व्रतमें स्थित रहते हुए मनको वशमें करके, मुझमें चित्त लगाये हुए, मुझे ही अपना परम प्राप्य मानकर साधन करनेके लिये बैठे' (गीता ६।१३-१४)। इस प्रकार स्मृतिप्रमाणसे भी यही सिद्ध होता है कि परम प्राप्य परमात्माके निरन्तर चिन्तनरूप ध्यानका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये। सम्बन्ध - उक्त साधन कैसे स्थानमें बैठकर करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥ ४ । १ । ११ ॥ अविशेषात् किसी विशेष स्थान या दिशाका विधान न होनेके कारण (यही सिद्ध होता है कि); यत्र=जहाँ; एकाग्रता=चित्तकी एकाग्रता (सुगमतासे हो सके); तत्र=वहीं (बैठकर ध्यानका अभ्यास करे)। व्याख्या-श्रुतिमें कहा है कि- समे शुचौ शर्करावह्नवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥