भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 486 में से

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पृष्ठ 421

४१८ वेदान्त-दर्शन [पाद १ लोकमें पहुँचता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुलीका त्याग कर देता है, ठीक उसी प्रकार, वह पापोंसे मुक्त होकर सामवेदकी श्रुतियोंके अभिमानी देवताओंद्वारा ऊपर ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है। वहाँ वह इस जीवघनरूप हिरण्यगर्भसे अत्यन्त श्रेष्ठ तथा सबके हृदयमें शयन करनेवाले परमपुरुषका साक्षात्कार करता है' (प्र० उ० ५। ५)। इस प्रकार मृत्युपर्यन्त निरन्तर उपासना करते रहनेका श्रुतिमें विधान होनेके कारण यही मानना उचित है कि आजीवन नित्य-निरन्तर उपासना करते रहना चाहिये। जिसको जीवनकालमें ही उस परमपुरुषका साक्षात्कार हो जाता है, उसका तो उस परमेश्वरसे कभी वियोग होता ही नहीं है, वह तो स्वभावसे ही उसमें संयुक्त हो जाता है तथापि वह जो मरणपर्यन्त निरन्तर उपासना करता रहता है, वह उसके अन्य कर्मोंकी भाँति लोकसंग्रहके लिये है, परंतु साधकके लिये तो मृत्युपर्यन्त उपासना परम आवश्यक है। अन्यथा योगभ्रष्ट हो जानेपर पुनर्जन्म अनिवार्य हो जाता है (गीता ६। ३७ से ४०) इसीलिये भगवान्‌ने मरणपर्यन्त साधन करते रहनेके लिये जगह-जगह कहा है (गीता २। ७२; ७। ३०; ८। ५, ८, ९, १०, १२, १३ इत्यादि)। सम्बन्ध — यहाँतक उपासनाविषयक वर्णनकी समाप्ति करके अब परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले साधनोंके फलके सम्बन्धमें विचार आरम्भ किया जाता है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जिसको जीवनकालमें ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, उसके पूर्वार्जित तथा भावी पुण्य-पापरूप कर्मोंका क्या होता है? इसपर कहते हैं— तदधिगमे उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्- व्यपदेशात् ॥ ४। १। १३ ॥ तदधिगमे = उस परब्रह्म परमात्माके प्राप्त हो जानेपर; उत्तरपूर्वाघयोः = आगे होनेवाले और पहले किये हुए पापोंका; अश्लेषविनाशौ = क्रमशः असम्पर्क एवं नाश होता है; तद्व्यपदेशात् = क्योंकि श्रुतिमें यही बात जगह-जगह कही गयी है।