वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १४ ] अध्याय ४ ४१९ व्याख्या - श्रुतिमें कहा गया है कि 'यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते।' अर्थात् जिस प्रकार कमलके पत्तेमें जल नहीं सटता है, उसी प्रकार पूर्वोक्त परमात्माको जाननेवाले महापुरुषमें पापकर्म लिप्त नहीं होते हैं।' (छा० उ० ४।१४।३)। इस प्रकार श्रुतिके द्वारा ज्ञानोत्तरकालमें होनेवाले पापकर्मोंसे ज्ञानीका अलिप्त रहना कहा गया है तथा यह दृष्टान्त भी दिया गया है, 'जिस प्रकार सरकंडेकी सींकके अग्रभागमें रहनेवाली तुला अग्निमें गिरायी जानेपर तत्काल भस्म हो जाती है, इसी प्रकार इस ज्ञानीके समस्त पाप निःसंदेह भस्म हो जाते हैं' (छा० उ० ५।२४।३)। मुण्डक (२।२।८) और गीता (४।३७) - में भी ऐसा ही कहा गया है। इस प्रकार श्रुतियों और स्मृतियोंमें ब्रह्मज्ञानके बाद लोकसंग्रहके लिये की जानेवाली व्यावहारिक चेष्टाओंमें होनेवाले आनुषंगिक पापोंका उसके साथ सम्बन्ध न होना और पूर्वकृत पापोंका सर्वथा नष्ट हो जाना बताया जानेके कारण यही निश्चय होता है कि परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके बाद उस सिद्ध पुरुषके पूर्वकृत पापोंका सर्वथा नाश हो जाता है और आगे होनेवाले पापोंसे उसका कभी सम्पर्क नहीं होता। सम्बन्ध - भगवत्प्राप्त पुरुषके पुण्यकर्मोंका क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं- इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तु ॥ ४।१।१४॥ इतरस्य = पुण्यकर्मसमुदायका; अपि = भी; एवम् = इसी प्रकार; असंश्लेषः = सम्बन्ध न होना और नाश हो जाना समझना चाहिये; पाते तु = देहपात होनेपर तो वह परमात्माको प्राप्त हो ही जाता है। व्याख्या - 'यह पुण्य और पाप इन दोनोंसे ही निःसन्देह तर जाता है।' (बृह० उ० ४।४।२२) इस प्रकार श्रुतिमें कहा जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि पाप-कर्मकी भाँति ही पूर्वकृत और आगे होनेवाले पुण्यकर्मोंसे भी जीवन्मुक्त अवस्थामें उस ज्ञानीका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, वह समस्त कर्मोंसे