वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ७ ] अध्याय ४ ४२७ है; क्योंकि उस प्रकरणमें पृथिवी, जल और तेज-इन तीन तत्त्वोंकी उत्पत्तिका वर्णन करके तीनोंका मिश्रण करनेकी बात कही है। अतः जिस तत्त्वकी प्रधानता है, उसीके नामसे वहाँ वे तीनों तत्त्व पुकारे गये हैं; इससे, शरीर पांचभौतिक है, यह बात प्रत्यक्ष दिखायी देनेसे तथा श्रुतिमें भी पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय और तेजोमय (बृह० उ० ४।४।५)-इन विशेषणोंका जीवात्माके साथ प्रयोग देखा जानेसे यही सिद्ध होता है कि प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके सहित जीवात्मा एकमात्र तेजस्तत्त्वमें स्थित नहीं होता; अपितु शरीरके बीजभूत पाँचों भूतोंके सूक्ष्म स्वरूपमें स्थित होता है। वही इसका सूक्ष्म शरीर है, जो कि कठोपनिषद्में रथके नामसे कहा गया है (क० उ० १।३।३) इसके सिवा स्मृतिमें भी कहा है- अण्व्यो मात्रा विनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः। ताभिः सार्धमिदं सर्वं सम्भवत्यनुपूर्वशः॥ 'पाँचों भूतोंकी जो विनाशशील पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द) कही गयी हैं, उनके साथ यह सम्पूर्ण जगत् क्रमशः उत्पन्न होता है।' (मनु० १।२७) सम्बन्ध- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मरणकालकी गतिका जो वर्णन किया गया है, यह साधारण मनुष्योंके विषयमें है या ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले तत्त्ववेत्ताओंके विषयमें? इसपर कहते हैं- समाना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य॥ ४। २। ७॥ आसृत्युपक्रमात् = देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमें जानेका क्रम आरम्भ होनेतक; समाना = दोनोंकी गति समान; च=ही है; च=क्योंकि; अनुपोष = सूक्ष्म शरीरको सुरक्षित रखकर ही; अमृतत्वम् = ब्रह्मलोकमें अमृतत्व लाभ करना ब्रह्मविद्याका फल बताया गया है।