वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—वाणी मनमें स्थित होती है, यहाँसे लेकर प्राण, मन और इन्द्रियोंसहित जो जीवात्माके सूक्ष्म भूतसमुदायमें स्थित होनेतकका यानी स्थूल शरीरसे निकलकर सूक्ष्म शरीरमें स्थित होनेतकका जो मार्ग बताया गया है, यहाँतक साधारण मनुष्योंकी और ब्रह्मलोकमें जानेवाले ज्ञानी पुरुषकी गति एक समान ही बतायी गयी है; क्योंकि सूक्ष्म शरीरके सुरक्षित रहते हुए ही इस लोकसे ब्रह्मलोकमें जाना होता है और वहाँ जाकर उसे अमृतस्वरूपकी प्राप्ति होती है। तथा अन्य लोकोंमें और शरीरोंमें भी सूक्ष्म शरीरद्वारा ही गमन होता है इसीलिये अलग-अलग वर्णन नहीं किया गया है। सम्बन्ध—उस प्रकरणके अन्तमें जो यह कहा गया है कि मन, इन्द्रियाँ और जीवात्माके सहित वह तेज परमदेवतामें स्थित होता है तो यह स्थित होना कैसा है; क्योंकि प्रकरण साधारण मनुष्योंका है, सभी समान भावसे परमदेव परमात्माको प्राप्त हो जायँ, यह सम्भव नहीं! इस जिज्ञासापर कहते हैं— तदापीतेः संसारव्यपदेशात् ॥ ४।२।८॥ संसारव्यपदेशात् = साधारण जीवोंका मरनेके बाद बार-बार जन्म ग्रहण करनेका कथन होनेके कारण (यही सिद्ध होता है कि); तत् = उनका वह सूक्ष्म शरीर; आ अपीतेः = मुक्तावस्था प्राप्त होनेतक रहता है, इसलिये नूतन स्थूल शरीर प्राप्त होनेके पहले-पहले उनका परमात्मामें स्थित रहना प्रलयकालकी भाँति है। व्याख्या—उस प्रकरणमें जो एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवालेका परम देवतामें स्थित होना कहा गया है, वह प्रलयकालकी भाँति कर्म- संस्कार और सूक्ष्म शरीरके सहित अज्ञानपूर्वक स्थित होना है। अतः वह परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति नहीं है; किंतु समस्त जगत् जिस प्रकार उस परम कारण परमात्मामें ही स्थित रहता है, उसी प्रकार स्थित होना है। यह स्थिति उस जीवात्माको जबतक अपने कर्मफल-उपभोगके उपयुक्त