भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 486 में से

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सूत्र ९ ] अध्याय ४ ४२९ कोई दूसरा शरीर नहीं मिलता, तबतक रहती है; क्योंकि उसके पुनर्जन्मका श्रुतिमें कथन है (क० उ० २।२।७)। इसलिये जबतक उसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती, तबतक उसका सूक्ष्म शरीरसे सम्बन्ध रहता है; अतः वह मुक्त पुरुषकी भाँति परमात्मामें विलीन नहीं होता। सम्बन्ध—उस प्रकरणमें तो जीवात्माका सबके सहित आकाशादि भूतोंमें स्थित होना बताया गया है, वहाँ यह नहीं कहा गया कि वह सूक्ष्मभूत- समुदायमें स्थित होता है; अतः उसे स्पष्ट करते हैं— सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ॥४। २।९॥ प्रमाणतः=वेद-प्रमाणसे; च=और; तथोपलब्धेः=वैसी उपलब्धि होनेसे भी (यही सिद्ध होता है कि); सूक्ष्मम्=(जिसमें जीवात्मा स्थित होता है वह) भूतसमुदाय सूक्ष्म है। व्याख्या—मरणकालमें जिस आकाशादि भूतसमुदायमें सबके सहित जीवात्माका स्थित होना कहा गया है, वह भूतसमुदाय सूक्ष्म है, स्थूल नहीं है*—यह बात श्रुतिके प्रमाणसे तो सिद्ध है ही, प्रत्यक्ष उपलब्धिसे भी सिद्ध होती है; क्योंकि श्रुतिमें जहाँ परलोक-गमनका वर्णन किया गया है, वहाँ कहा है— शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ 'इस जीवात्माके हृदयमें एक सौ एक नाडियाँ हैं, उनमेंसे एक कपालकी ओर निकली हुई है, इसीको सुषुम्णा कहते हैं, उसके द्वारा ऊपर जाकर मनुष्य अमृतभावको प्राप्त होता है, दूसरी नाडियाँ मरणकालमें नाना योनियोंमें ले जानेवाली होती हैं।' (छा० उ० ८।६।६) इसमें जो नाडीद्वारा निकलकर जानेकी बात कही है, यह सूक्ष्म भूतोंमें स्थित जीवात्माके लिये ही सम्भव है; तथा मरणकालमें समीपवर्ती मनुष्योंको

  • यह विषय सूत्र १।४।२ में भी देखना चाहिये।