भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 438

सूत्र १७ ] अध्याय ४ ४३५ ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मलोकमें जाता है। फिर प्रसंगवश नवेंसे ग्यारहवें सूत्रतक सूक्ष्म शरीरकी सिद्धि की गयी और बारहवेंसे सोलहवेंतक, जिन महापुरुषोंको जीवनकालमें ही ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है, वे ब्रह्मलोकमें न जाकर यहीं ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं, यह निर्णय किया गया; अब इस सत्रहवें सूत्रसे ब्रह्मलोकमें जानेवाले विद्वान्‌की गतिके विषयमें पुनः विचार आरम्भ करते हैं। सूक्ष्म शरीरमें स्थित होनेके अनन्तर वह विद्वान् किस प्रकार ब्रह्मलोकमें जाता है, यह बतानेके लिये अगला प्रकरण प्रस्तुत किया जाता है— तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेषगत्य- नुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया॥ ४। २। १७॥ (स्थूल शरीरसे निकलते समय) तदोकोऽग्रज्वलनम्=उस जीवात्माका निवासस्थान जो हृदय है, उसके अग्रभागमें प्रकाश हो जाता है; तत्प्रकाशित- द्वारः=उस प्रकाशसे जिनके निकलनेका द्वार प्रकाशित हो गया है, ऐसा वह विद्वान् ; विद्यासामर्थ्यात्=ब्रह्मविद्याके प्रभावसे; च=तथा; तच्छेषगत्यनुस्मृति- योगात्=उस विद्याका शेष अंग जो ब्रह्मलोकमें गमन है, उस गमनविषयक संस्कारकी स्मृतिके योगसे; हार्दानुगृहीतः=हृदयस्थ परमेश्वरकी कृपासे अनुगृहीत हुआ; शताधिकया=एक सौ नाड़ियोंसे अधिक जो एक (सुषुम्णा) नाडी है, उसके द्वारा (ब्रह्मरन्ध्रसे निकलता है)। व्याख्या—श्रुतिमें मरणासन्न मनुष्यके समस्त इन्द्रिय, प्राण तथा अन्तः- करणके लिंगशरीरमें एक हो जानेकी बात कहकर हृदयके अग्रभागमें प्रकाश होनेका कथन आया है* (बृह० उ० ४। ४। २) तथा साधारण मनुष्य और ब्रह्मवेत्ताके निकलनेका रास्ता इस प्रकार भिन्न-भिन्न बताया है कि 'हृदयसे सम्बद्ध एक सौ एक नाड़ियाँ हैं, उनमेंसे एक मस्तककी ओर निकली है, उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला विद्वान् अमृतत्वको प्राप्त होता है,

  • 'तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति।' 'इसके उस हृदयका अग्रभाग प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा निकलता है।'