वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३४ वेदान्त-दर्शन [पाद २ सम्बन्ध - शरीरसम्बन्धी सब तत्त्वोंके सहित वह महापुरुष उस परमात्मामें किस प्रकार स्थित होता है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं- अविभागो वचनात् ॥ ४ । २ । १६ ॥ वचनात् = श्रुतिके कथनसे (यह मालूम होता है कि); अविभागः = विभाग नहीं रहता। व्याख्या - मरणकालमें साधारण मनुष्योंका जीवात्माके सहित उस परमदेवमें स्थित होना कहा गया है तथा अपने-अपने कर्मानुसार भिन्न- भिन्न योनियोंमें कर्मफलका उपभोग करनेके लिये वहाँसे उनका जाना भी बताया गया है (क० उ० २।५।७)। इसलिये प्रलयकी भाँति परमात्मामें स्थित होकर भी वे उनसे विभक्त ही रहते हैं; किंतु यह ब्रह्मज्ञानी महापुरुष तो सब तत्त्वोंके सहित यहीं परमात्मामें लीन होता है; अतः विभागरहित होकर अपने परम कारणभूत ब्रह्ममें मिल जाता है। श्रुति भी ऐसा ही वर्णन करती है- 'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परमपुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।'* (मु० उ० ३।२।८) सम्बन्ध-ब्रह्मलोकमें जानेवालोंकी गतिका प्रकार बतानेके उद्देश्यसे प्रकरण आरम्भ करके सातवें सूत्रमें यह सिद्ध किया गया कि मृत्युकालमें प्राण, मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्मा स्थूल शरीरसे निकलते समय सूक्ष्म पाँच भूतोंके समुदायरूप सूक्ष्म शरीरमें स्थित होता है। यहाँतक तो साधारण मनुष्यके समान ही विद्वान्की भी गति है। उसके बाद आठवें सूत्रमें यह निर्णय किया गया कि साधारण मनुष्य तो सबके कारणरूप परमेश्वरमें प्रलयकालकी भाँति स्थित होकर परमेश्वरके विधानानुसार कर्मफलभोगके लिये दूसरे शरीरमें चले जाते हैं, किंतु
- यह मन्त्र सूत्र १।३।२ की व्याख्यामें अर्थसहित आ गया है।