भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

सूत्र १५ ] अध्याय ४ ४३३ (गीता ५।२६)। इस प्रकार स्मृतिमें जगह-जगह उन महापुरुषोंका जीवनकालमें ही ब्रह्मको प्राप्त होना कहा गया है तथा जहाँ गमनका प्रकरण आया है, वहाँ शरीरसे समस्त सूक्ष्म तत्त्वोंको साथ लेकर ही गमन करनेकी बात कही है (१५।७)। इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि जिन महापुरुषोंको जीवनकालमें ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, उनका किसी भी परलोकमें गमन नहीं होता है। सम्बन्ध— जो महात्मा जीवनकालमें परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं, वे यदि परलोकमें नहीं जाते तो शरीरनाशके समय कहाँ रहते हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तानि परे तथा ह्याह॥ ४।२।१५॥ तानि=वे प्राण, अन्तःकरण, पाँच सूक्ष्मभूत तथा इन्द्रियाँ सब-के- सब; परे = उस परब्रह्ममें (विलीन हो जाते हैं); हि = क्योंकि; तथा = ऐसा ही; आह = श्रुति कहती है। व्याख्या—जो महापुरुष जीवनकालमें ही परमात्माको प्राप्त हो जाता है, वह एक प्रकारसे निरन्तर उस परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता है; उससे कभी अलग नहीं होता तो भी लोकदृष्टिसे शरीरमें रहता है, अतः जब प्रारब्ध पूरा होनेपर शरीरका नाश हो जाता है, उस समय वह शरीर, अन्तःकरण और इन्द्रिय आदि सब कलाओंके सहित उस परमात्मामें ही विलीन हो जाता है। श्रुतिमें भी यही कहा है—'उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ और मनसहित समस्त इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी देवताओंमें स्थित हो जाते हैं, उनके साथ जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसके बाद विज्ञानमय जीवात्मा, उसके समस्त कर्म और उपर्युक्त सब देवता—ये सब-के-सब परब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं' (मु० उ० ३।२।७)।*

  • यह मन्त्र सूत्र १।४।२१ की व्याख्यामें आ गया है।