वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ है।' (नृसिंहो० ५) इसके सिवा, बृहदारण्यकोपनिषद्के अगले मन्त्रमें यह भी कहा है कि 'अत्र ब्रह्म समश्नुते'—'वह यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है' (बृह० उ० ४।४।७)। दूसरी श्रुतिमें यह भी बताया गया है कि— विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ 'यह जीवात्मा समस्त प्राण, पाँचों भूत तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंके सहित जिसमें प्रतिष्ठित है, उस परम अविनाशी परमात्माको जो जान लेता है, हे सोम्य! वह सर्वज्ञ महापुरुष उस सर्वरूप परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है' (प्र० उ० ४।११)। इन सब श्रुतिप्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि उस महापुरुषका लोकान्तरमें गमन नहीं होता। तथा जीवात्मासे प्राणोंके उत्क्रमणके निषेधकी यहाँ आवश्यकता भी नहीं है; इसलिये उस श्रुतिके द्वारा जीवात्मासे प्राणोंके अलग होनेका निषेध मानना असंगत है। सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे उसी बातको दृढ़ करते हैं— स्मर्यते च॥ ४।२।१४॥ च=तथा; स्मर्यते=स्मृतिसे भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—'जिसका मोह सर्वथा नष्ट हो गया है, ऐसा स्थितप्रज्ञ ब्रह्मवेत्ता ब्रह्ममें स्थित रहता हुआ न तो प्रियको पाकर हर्षित होता है और न अप्रियको पाकर उद्विग्न ही होता है१ (गीता ५।२०)। 'जिनके पाप सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, जो सब प्राणियोंके हितमें संलग्न हैं तथा जिनके समस्त संशय नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विजितात्मा महापुरुष शान्त ब्रह्मको प्राप्त हैं'२ (गीता ५। २५)। 'उनके सब ओर ब्रह्म ही बरतता है'३ १-न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः॥ २-लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥ ३-अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥