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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

४३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

४३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ है।' (नृसिंहो० ५) इसके सिवा, बृहदारण्यकोपनिषद्के अगले मन्त्रमें यह भी कहा है कि 'अत्र ब्रह्म समश्नुते'—'वह यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है' (बृह० उ० ४।४।७)। दूसरी श्रुतिमें यह भी बताया गया है कि— विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ 'यह जीवात्मा समस्त प्राण, पाँचों भूत तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंके सहित जिसमें प्रतिष्ठित है, उस परम अविनाशी परमात्माको जो जान लेता है, हे सोम्य! वह सर्वज्ञ महापुरुष उस सर्वरूप परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है' (प्र० उ० ४।११)। इन सब श्रुतिप्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि उस महापुरुषका लोकान्तरमें गमन नहीं होता। तथा जीवात्मासे प्राणोंके उत्क्रमणके निषेधकी यहाँ आवश्यकता भी नहीं है; इसलिये उस श्रुतिके द्वारा जीवात्मासे प्राणोंके अलग होनेका निषेध मानना असंगत है। सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे उसी बातको दृढ़ करते हैं— स्मर्यते च॥ ४।२।१४॥ च=तथा; स्मर्यते=स्मृतिसे भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—'जिसका मोह सर्वथा नष्ट हो गया है, ऐसा स्थितप्रज्ञ ब्रह्मवेत्ता ब्रह्ममें स्थित रहता हुआ न तो प्रियको पाकर हर्षित होता है और न अप्रियको पाकर उद्विग्न ही होता है१ (गीता ५।२०)। 'जिनके पाप सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, जो सब प्राणियोंके हितमें संलग्न हैं तथा जिनके समस्त संशय नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विजितात्मा महापुरुष शान्त ब्रह्मको प्राप्त हैं'२ (गीता ५। २५)। 'उनके सब ओर ब्रह्म ही बरतता है'३ १-न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः॥ २-लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥ ३-अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥

सूत्र १५ ] अध्याय ४ ४३३

सूत्र १५ ] अध्याय ४ ४३३ (गीता ५।२६)। इस प्रकार स्मृतिमें जगह-जगह उन महापुरुषोंका जीवनकालमें ही ब्रह्मको प्राप्त होना कहा गया है तथा जहाँ गमनका प्रकरण आया है, वहाँ शरीरसे समस्त सूक्ष्म तत्त्वोंको साथ लेकर ही गमन करनेकी बात कही है (१५।७)। इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि जिन महापुरुषोंको जीवनकालमें ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, उनका किसी भी परलोकमें गमन नहीं होता है। सम्बन्ध— जो महात्मा जीवनकालमें परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं, वे यदि परलोकमें नहीं जाते तो शरीरनाशके समय कहाँ रहते हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तानि परे तथा ह्याह॥ ४।२।१५॥ तानि=वे प्राण, अन्तःकरण, पाँच सूक्ष्मभूत तथा इन्द्रियाँ सब-के- सब; परे = उस परब्रह्ममें (विलीन हो जाते हैं); हि = क्योंकि; तथा = ऐसा ही; आह = श्रुति कहती है। व्याख्या—जो महापुरुष जीवनकालमें ही परमात्माको प्राप्त हो जाता है, वह एक प्रकारसे निरन्तर उस परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता है; उससे कभी अलग नहीं होता तो भी लोकदृष्टिसे शरीरमें रहता है, अतः जब प्रारब्ध पूरा होनेपर शरीरका नाश हो जाता है, उस समय वह शरीर, अन्तःकरण और इन्द्रिय आदि सब कलाओंके सहित उस परमात्मामें ही विलीन हो जाता है। श्रुतिमें भी यही कहा है—'उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ और मनसहित समस्त इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी देवताओंमें स्थित हो जाते हैं, उनके साथ जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसके बाद विज्ञानमय जीवात्मा, उसके समस्त कर्म और उपर्युक्त सब देवता—ये सब-के-सब परब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं' (मु० उ० ३।२।७)।*

  • यह मन्त्र सूत्र १।४।२१ की व्याख्यामें आ गया है।

४३४ वेदान्त-दर्शन [पाद २

४३४ वेदान्त-दर्शन [पाद २ सम्बन्ध - शरीरसम्बन्धी सब तत्त्वोंके सहित वह महापुरुष उस परमात्मामें किस प्रकार स्थित होता है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं- अविभागो वचनात् ॥ ४ । २ । १६ ॥ वचनात् = श्रुतिके कथनसे (यह मालूम होता है कि); अविभागः = विभाग नहीं रहता। व्याख्या - मरणकालमें साधारण मनुष्योंका जीवात्माके सहित उस परमदेवमें स्थित होना कहा गया है तथा अपने-अपने कर्मानुसार भिन्न- भिन्न योनियोंमें कर्मफलका उपभोग करनेके लिये वहाँसे उनका जाना भी बताया गया है (क० उ० २।५।७)। इसलिये प्रलयकी भाँति परमात्मामें स्थित होकर भी वे उनसे विभक्त ही रहते हैं; किंतु यह ब्रह्मज्ञानी महापुरुष तो सब तत्त्वोंके सहित यहीं परमात्मामें लीन होता है; अतः विभागरहित होकर अपने परम कारणभूत ब्रह्ममें मिल जाता है। श्रुति भी ऐसा ही वर्णन करती है- 'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परमपुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।'* (मु० उ० ३।२।८) सम्बन्ध-ब्रह्मलोकमें जानेवालोंकी गतिका प्रकार बतानेके उद्देश्यसे प्रकरण आरम्भ करके सातवें सूत्रमें यह सिद्ध किया गया कि मृत्युकालमें प्राण, मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्मा स्थूल शरीरसे निकलते समय सूक्ष्म पाँच भूतोंके समुदायरूप सूक्ष्म शरीरमें स्थित होता है। यहाँतक तो साधारण मनुष्यके समान ही विद्वान्की भी गति है। उसके बाद आठवें सूत्रमें यह निर्णय किया गया कि साधारण मनुष्य तो सबके कारणरूप परमेश्वरमें प्रलयकालकी भाँति स्थित होकर परमेश्वरके विधानानुसार कर्मफलभोगके लिये दूसरे शरीरमें चले जाते हैं, किंतु

  • यह मन्त्र सूत्र १।३।२ की व्याख्यामें अर्थसहित आ गया है।

सूत्र १७ ] अध्याय ४ ४३५

सूत्र १७ ] अध्याय ४ ४३५ ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मलोकमें जाता है। फिर प्रसंगवश नवेंसे ग्यारहवें सूत्रतक सूक्ष्म शरीरकी सिद्धि की गयी और बारहवेंसे सोलहवेंतक, जिन महापुरुषोंको जीवनकालमें ही ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है, वे ब्रह्मलोकमें न जाकर यहीं ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं, यह निर्णय किया गया; अब इस सत्रहवें सूत्रसे ब्रह्मलोकमें जानेवाले विद्वान्‌की गतिके विषयमें पुनः विचार आरम्भ करते हैं। सूक्ष्म शरीरमें स्थित होनेके अनन्तर वह विद्वान् किस प्रकार ब्रह्मलोकमें जाता है, यह बतानेके लिये अगला प्रकरण प्रस्तुत किया जाता है— तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेषगत्य- नुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया॥ ४। २। १७॥ (स्थूल शरीरसे निकलते समय) तदोकोऽग्रज्वलनम्=उस जीवात्माका निवासस्थान जो हृदय है, उसके अग्रभागमें प्रकाश हो जाता है; तत्प्रकाशित- द्वारः=उस प्रकाशसे जिनके निकलनेका द्वार प्रकाशित हो गया है, ऐसा वह विद्वान् ; विद्यासामर्थ्यात्=ब्रह्मविद्याके प्रभावसे; च=तथा; तच्छेषगत्यनुस्मृति- योगात्=उस विद्याका शेष अंग जो ब्रह्मलोकमें गमन है, उस गमनविषयक संस्कारकी स्मृतिके योगसे; हार्दानुगृहीतः=हृदयस्थ परमेश्वरकी कृपासे अनुगृहीत हुआ; शताधिकया=एक सौ नाड़ियोंसे अधिक जो एक (सुषुम्णा) नाडी है, उसके द्वारा (ब्रह्मरन्ध्रसे निकलता है)। व्याख्या—श्रुतिमें मरणासन्न मनुष्यके समस्त इन्द्रिय, प्राण तथा अन्तः- करणके लिंगशरीरमें एक हो जानेकी बात कहकर हृदयके अग्रभागमें प्रकाश होनेका कथन आया है* (बृह० उ० ४। ४। २) तथा साधारण मनुष्य और ब्रह्मवेत्ताके निकलनेका रास्ता इस प्रकार भिन्न-भिन्न बताया है कि 'हृदयसे सम्बद्ध एक सौ एक नाड़ियाँ हैं, उनमेंसे एक मस्तककी ओर निकली है, उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला विद्वान् अमृतत्वको प्राप्त होता है,

  • 'तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति।' 'इसके उस हृदयका अग्रभाग प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा निकलता है।'

[ पाद २

४३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शरीरसे जाते समय अन्य नाडियाँ इधर-उधरके मार्गसे नाना योनियोंमें ले जानेवाली होती है',१ (छा० उ० ८। ६। ६) इन श्रुतिप्रमाणोंसे यही निश्चय होता है कि मरणकालमें वह महापुरुष हृदयके अग्रभागमें होनेवाले प्रकाशसे प्रकाशित ब्रह्मरन्ध्रके मार्गसे इस स्थूल शरीरके बाहर निकलता है और ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसके फलस्वरूप ब्रह्मलोककी प्राप्तिके संस्कारकी स्मृतिसे युक्त हो हृदयस्थित सर्वसुहृद् परब्रह्म परमेश्वरसे अनुगृहीत हुआ सूर्यकी रश्मियोंमें चला जाता है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— रश्म्यनुसारी ॥ ४।२।१८ ॥ रश्म्यनुसारी = सूर्यकी रश्मियोंमें स्थित हो उन्हींका अवलम्बन करके (वह सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है)। व्याख्या—'इस स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर वह जीवात्मा इन सूर्यकी रश्मियोंद्वारा ऊपर चढ़ता है, वहाँ 'ॐ' ऐसा कहता हुआ जितनी देरमें मन जाता है, उतने ही समयमें सूर्यलोकमें पहुँच जाता है, यह सूर्य ही विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकमें जानेका द्वार है, यह अविद्वानोंके लिये बंद रहता है; इसलिये वे नीचेके लोकोंमें जाते हैं',२ (छा० उ० ८।६।५)। इस श्रुतिके कथनसे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मरन्ध्रके मार्गद्वारा स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर ब्रह्मवेत्ता सूर्यकी रश्मियोंमें स्थित होकर उन्हींका आश्रय ले सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है; उसमें उसको विलम्ब नहीं होता। सम्बन्ध—रात्रिके समय तो सूर्यकी रश्मियाँ नहीं रहतीं, अतः यदि १-यह मन्त्र ४।२।९ की व्याख्यामें अर्थसहित आ गया है। २-'अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद् वा मीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद् वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम्॥'

सूत्र १९ ] अध्याय ४ ४३७

सूत्र १९ ] अध्याय ४ ४३७ किसी ज्ञानीका देहपात रात्रिके समय हो तो उसका क्या होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— निशि नेति चेन्न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वा- दर्शयति च॥ ४।२।१९॥ चेत्=यदि कहो कि; निशि=रात्रिमें; न=सूर्यकी रश्मियोंसे नाडीद्वारा उसका सम्बन्ध नहीं होता; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं; (हि)=क्योंकि; सम्बन्धस्य=नाडी और सूर्य-रश्मियोंके सम्बन्धकी; यावद्देहभावित्वात्=जब- तक शरीर रहता है; तबतक सत्ता बनी रहती है, इसलिये (दिन हो या रात, कभी भी नाडी और सूर्य-रश्मियोंका सम्बन्ध विच्छिन्न नहीं होता); दर्शयति च=यही बात श्रुति भी दिखाती है। व्याख्या—यदि कोई ऐसा कहे कि रात्रिमें देहपात होनेपर नाड़ियोंसे सूर्य-किरणोंका सम्बन्ध नहीं होगा, इसलिये उस समय मृत्युको प्राप्त हुआ विद्वान् सूर्यलोकके मार्गसे गमन नहीं कर सकता, तो उसका यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें कहा है कि—'इस सूर्यकी ये रश्मियाँ इस लोकमें और उस सूर्यलोकमें—दोनों जगह गमन करती हैं, वे सूर्यमण्डलसे निकलती हुई शरीरकी नाडियोंमें व्याप्त हो रही हैं तथा नाडियोंसे निकलती हुई सूर्यमें फैली हुई हैं।'* (छा० उ० ८।६।२) इसलिये श्रुतिके इस कथनानुसार जबतक शरीर रहता है, तबतक हर जगह और हर समय सूर्यकी रश्मियाँ उसकी नाडियोंमें व्याप्त रहती हैं; अतः किसी समय भी देहपात होनेपर सूक्ष्म शरीरसहित जीवात्माका नाड़ियोंके द्वारा तत्काल सूर्यकी रश्मियोंसे सम्बन्ध होता है और वह विद्वान् सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है। सम्बन्ध—क्या दक्षिणायनकालमें मरनेपर भी विद्वान् ब्रह्मलोकमें चला जाता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

  • एता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥

४३८ वेदान्त-दर्शन [पाद २

४३८ वेदान्त-दर्शन [पाद २ अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ॥ ४।२।२०॥ अतः = इस पूर्वमें कहे हुए कारणसे; च = ही; दक्षिणे = दक्षिण; अयने = अयनमें; अपि = (मरनेवालेका) भी (ब्रह्मलोकमें गमन हो जाता है)। व्याख्या - पूर्वसूत्रके कथनानुसार जिस प्रकार रात्रिके समय सूर्यकी रश्मियोंसे सम्बन्ध हो जानेमें कोई बाधा नहीं होती, उसी प्रकार दक्षिणायन कालमें भी कोई बाधा न होनेसे वह विद्वान् सूर्यलोकके मार्गसे जा सकता है। इसलिये यही समझना चाहिये कि दक्षिणायनके समय शरीर छोड़कर जानेवाला महापुरुष भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे सूर्यलोकके द्वारसे तत्काल ब्रह्मलोकमें पहुँच जाता है। भीष्म आदि महापुरुषोंके विषयमें जो उत्तरायणकालकी प्रतीक्षाका वर्णन आता है उसका आशय यह हो सकता है कि भीष्मजी वसु देवता थे, उनको देवलोकमें जाना था और दक्षिणायनके समय देवलोकमें रात्रि रहती है। इसलिये वे कुछ दिनोंतक प्रतीक्षा करते रहे। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'हे अर्जुन! जिस कालमें शरीर त्यागकर गये हुए योगीलोग पीछे न लौटनेवाली और पीछे लौटनेवाली गतिको प्राप्त होते हैं, वह काल मैं तुझे बतलाता हूँ' (गीता ८।२३)- इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण आदि कालको तो अपुनरावृत्तिकारक बताया गया है तथा रात्रि और दक्षिणायन आदिको पुनरावृत्तिका काल नियत किया गया है; फिर यहाँ कैसे कहा गया कि रात्रि और दक्षिणायनमें भी देहत्याग करनेवाला विद्वान् ब्रह्मलोकमें जा सकता है? इसपर कहते हैं- योगिनः प्रति च स्मर्यते स्मार्ते चैते ॥ ४।२।२१॥ च = इसके सिवा; योगिनः = योगीके; प्रति = लिये (यह कालविशेषका नियम); स्मर्यते = स्मृतिमें कहा जाता है; च = तथा; एते = (वहाँ कहे हुए) ये अपुनरावृत्ति और पुनरावृत्तिरूप दोनों मार्ग; स्मार्ते = स्मार्त हैं। व्याख्या - गीतामें जिन दो गतियोंका वर्णन है, वे स्मार्त अर्थात्

सूत्र २१ ] अध्याय ४ ४३९

सूत्र २१ ] अध्याय ४ ४३९ श्रुतिवर्णित मार्गसे भिन्न हैं। इसके सिवा वे योगीके लिये कहे गये हैं। इस प्रकार विषयका भेद होनेके कारण वहाँ आवृत्ति और अनावृत्तिके लिये नियत किये हुए कालविशेषसे इस श्रुतिनिरूपित गतिमें कोई विरोध नहीं आता। जो लोग गीताके श्लोकोंमें काल शब्दके प्रयोगसे दिन, रात, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन— इन शब्दोंको कालवाचक मानकर उनसे कालविशेषको ही ग्रहण करते हैं, उन्हींके लिये यह समाधान किया गया है; किंतु यदि उन शब्दोंका अर्थ लोकान्तरमें पहुँचानेवाले उन-उन कालोंके अभिमानी देवता मान लिया जाय तो श्रुतिके वर्णनसे कोई विरोध नहीं है। दूसरा पाद सम्पूर्ण

तीसरा पाद

तीसरा पाद दूसरे पादमें यह बताया गया कि ब्रह्मलोकमें जानेके मार्गका आरम्भ होनेसे पूर्वतककी गति (वाणीका मनमें लय होना आदि) विद्वान् और अविद्वान् दोनोंके लिये एक समान हैं; फिर अविद्वान् कर्मानुसार संसारमें पुनः नूतन शरीर ग्रहण करता है और ज्ञानी महापुरुष ज्ञानसे प्रकाशित मोक्षनाडीद्वारका आश्रय ले सूर्यकी रश्मियोंद्वारा सूर्यलोकमें पहुँचकर वहाँसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है। रात्रि और दक्षिणायन-कालमें भी विद्वान्‌की इस ऊर्ध्वगतिमें कोई बाधा नहीं आती; किंतु ब्रह्मलोकमें जानेका जो मार्ग है, उसका वर्णन कहीं अर्चिमार्ग, कहीं उत्तरायणमार्ग और कहीं देवयानमार्गके नामसे किया गया है तथा इन मार्गोंके चिह्न भी भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उपासना और अधिकारीके भेदसे ये मार्ग भिन्न-भिन्न हैं या एक ही मार्गके ये सभी नाम हैं? इसके सिवा, मार्गमें कहीं तो नाना देवताओंके लोकोंका वर्णन आता है, कहीं दिन, पक्ष, मास, अयन और संवत्सरका वर्णन आता है और कहीं केवल सूर्यरश्मियों तथा सूर्यलोकका ही वर्णन आता है; यह वर्णनका भेद एक मार्ग माननेसे किस प्रकार संगत होगा ? अतः इस विषयका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद तथा अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॥ ४। ३। १॥ अर्चिरादिना = अर्चिसे आरम्भ होनेवाले एक ही मार्गसे ( ब्रह्मलोकको जाते हैं); तत्प्रथितेः = क्योंकि ब्रह्मज्ञानियोंके लिये यह एक ही मार्ग (विभिन्न नामोंसे) प्रसिद्ध है। व्याख्या — श्रुतियोंमें ब्रह्मलोकमें जानेके लिये विभिन्न नामोंसे जिसका वर्णन किया गया है, वह एक ही मार्ग है, अनेक मार्ग नहीं हैं।

सूत्र २ ] अध्याय ४ ४४१

सूत्र २ ] अध्याय ४ ४४१ उस मार्गका प्रसिद्ध नाम अर्चिः आदि है, क्योंकि वह अर्चिसे प्रारम्भ होनेवाला मार्ग है। इसके द्वारा ही ब्रह्मलोकमें जानेवाले सब साधक जाते हैं। इसीका देवयान, उत्तरायणमार्ग आदि नामोंसे वर्णन आया है। तथा मार्गमें आनेवाले लोकोंका जो वर्णन आता है, वह कहीं कम है, कहीं अधिक है। उन स्थलोंमें जहाँ जिस लोकका वर्णन नहीं किया गया है, वहाँ उसका अन्यत्रके वर्णनसे अध्याहार कर लेना चाहिये। सम्बन्ध — एक जगह कहे हुए लोकोंका दूसरी जगह किस प्रकार अध्याहार करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ ४ । ३ । २ ॥ वायुम् = वायुलोकको; अब्दात् = संवत्सरके बाद (और सूर्यके पहले समझना चाहिये); अविशेषविशेषाभ्याम् = क्योंकि कहीं वायुका वर्णन समानभावसे है और कहीं विशेषभावसे है। व्याख्या — एक श्रुति कहती है 'जो इस प्रकार ब्रह्मविद्याके रहस्यको जानते हैं तथा जो वनमें रहकर श्रद्धापूर्वक सत्यकी उपासना करते हैं, वे अर्चि (ज्योति, अग्नि अथवा सूर्यकिरण) -को प्राप्त होते हैं, अर्चिसे दिनको, दिनसे शुक्लपक्षको, शुक्लपक्षसे उत्तरायणके छः महीनोंको, छः महीनोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे सूर्यको, सूर्यसे चन्द्रमाको तथा चन्द्रमासे विद्युत्को। वहाँसे अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है, यह देवयानमार्ग है' (छा० उ० ५ । १० । १-२)। दूसरी श्रुतिका कथन है— 'जब यह मनुष्य इस लोकसे ब्रह्मलोकको जाता है, तब वह वायुको प्राप्त होता है, वायु उसके लिये रथ-चक्रके छिद्रकी भाँति रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे वह ऊपर चढ़ता है, फिर वह सूर्यको प्राप्त होता है, वहाँ उसे सूर्य लम्बर नामके वाद्यमें रहनेवाले छिद्रके सदृश रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह चन्द्रमाको प्राप्त होता है, चन्द्रमा उसके लिये नगारेके छिद्रके सदृश रास्ता दे देता

४४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

४४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह शोकरहित ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाता है, वहाँ अनन्तकालतक निवास करता है (उसके बाद ब्रह्ममें लीन हो जाता है) (बृह० उ० ५। १०। १)। तीसरी श्रुति कहती है—'वह इस देवयानमार्गको प्राप्त होकर अग्निलोकमें आता है, फिर वायुलोक, सूर्यलोक, वरुणलोक, इन्द्रलोक तथा प्रजापतिलोकमें होता हुआ ब्रह्मलोकमें पहुँच जाता है।' (कौ० उ० १। ३) इन वर्णनोंमें वायुलोकका वर्णन दो श्रुतियोंमें आया है। कौषीतकि- उपनिषद्में तो केवल लोकोंका नाममात्र कह दिया, विशेषरूपसे क्रमका स्पष्टीकरण नहीं किया; किंतु बृहदारण्यकमें वायुलोकसे सूर्यलोकमें जानेका उल्लेख स्पष्ट है। अतः अर्चिसे आरम्भ करके मार्गका वर्णन करनेवाली छान्दोग्योपनिषद्की श्रुतिमें अग्निके स्थानमें तो अर्चि कही है, परंतु वहाँ वायुलोकका वर्णन नहीं है, इसलिये वायुलोकको संवत्सरके बाद और सूर्यके पहले मानना चाहिये। सम्बन्ध—वरुण, इन्द्र और प्रजापति लोकका भी अर्चि आदि मार्गमें वर्णन नहीं है, अतः उनको किसके बाद समझना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तडितोऽधि वरुणः सम्बन्धात्॥ ४। ३। ३॥ तडितः=विद्युत्से; अधि=ऊपर; वरुणः=वरुणलोक (समझना चाहिये); सम्बन्धात्=क्योंकि उन दोनोंका परस्पर सम्बन्ध है। व्याख्या—वरुण जलका स्वामी है, विद्युत्का जलसे निकटतम सम्बन्ध है, इसलिये विद्युत्के ऊपर वरुणलोककी स्थिति समझनी चाहिये। उसके बाद इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंकी स्थिति भी उस श्रुतिमें कहे हुए क्रमानुसार समझ लेनी चाहिये। इस प्रकार सब श्रुतियोंकी एकता हो जायगी और एक मार्ग माननेमें किसी प्रकारका विरोध नहीं रहेगा। सम्बन्ध—अर्चिरादि मार्गमें जो अर्चि, अहः, पक्ष, अयन, संवत्सर,

सूत्र ४-५ ] अध्याय ४ ४४३

सूत्र ४-५ ] अध्याय ४ ४४३ वायु और विद्युत् आदि बताये गये हैं; वे जड हैं या चेतन ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आतिवाहिकास्तल्लिंङ्गात् ॥ ४ । ३ । ४ ॥ आतिवाहिकाः=वे सब साधकको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा देनेवाले उन-उन लोकोंके अभिमानी पुरुष हैं; तल्लिंङ्गात्=क्योंकि श्रुतिमें वैसा ही लक्षण देखा जाता है। व्याख्या—अर्चि, अहः आदि शब्दोंद्वारा कहे जानेवाले ये सब उन-उन नाम और लोकोंके अभिमानी देवता या मानवाकृति पुरुष हैं। इनका काम ब्रह्मलोकमें जानेवाले विद्वान्को एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा देना है; इसीलिये इनको आतिवाहिक कहते हैं। विद्युल्लोकमें पहुँचनेपर अमानव पुरुष उस ज्ञानीको ब्रह्मकी प्राप्ति कराता है। उसके लिये जो अमानव विशेषण दिया गया है, उससे सिद्ध होता है कि उसके पहले जो अर्चि आदिको प्राप्त होना कहा गया है, वे उन-उन लोकोंके अभिमानी देवता—मानवाकार पुरुष हैं। हैं वे भी दिव्य ही, परंतु उनकी आकृति मानवों-जैसी है। सम्बन्ध—इस प्रकार अभिमानी देवता माननेकी क्या आवश्यकता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— उभयव्यामोहात्तत्सिद्धेः ॥ ४ । ३ । ५ ॥ उभयव्यामोहात्=दोनोंके मोहयुक्त होनेका प्रसंग आ जाता है, इसलिये; तत्सिद्धेः=उनको अभिमानी देवता माननेसे ही उनके द्वारा ब्रह्मलोकतक ले जानेका कार्य सिद्ध हो सकता है (अतः वैसा ही मानना चाहिये)। व्याख्या—यदि अर्चि आदि शब्दोंसे उनके अभिमानी देवता न मानकर उन्हें ज्योति और लोकविशेषरूप जड पदार्थ मान लें तो दोनोंके ही मोहयुक्त (मार्ग-ज्ञानशून्य) होनेसे ब्रह्मलोकतक पहुँचना ही सम्भव न होगा; क्योंकि गमन करनेवाला जीवात्मा तो वहाँके मार्गसे परिचित है नहीं,

४४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

४४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ उसको आगे ले जानेवाले अर्चि आदि भी यदि चेतन न हों तो मार्गको जाननेवाला कोई न रहनेसे देवयान और पितृयानमार्गका ज्ञान होना असम्भव हो जायगा। इसलिये अर्चि आदि शब्दोंसे उन-उनके अभिमानी देवताओंका वर्णन मानना आवश्यक है। तभी उनके द्वारा ब्रह्मलोक- तक पहुँचानेका कार्य सिद्ध हो सकेगा। अतः मार्गमें जिन-जिन लोकोंका वर्णन आया है, उनसे उन-उन लोकोंके अधिष्ठाता देवताको ही समझना चाहिये, अपने लोकसे अगले लोकमें पहुँचा देना ही उनका काम है। सम्बन्ध—विद्युत्-लोकके अनन्तर यह कहा गया है कि वह अमानव पुरुष उनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है। (छा० उ० ५।१०।१) तब बीचमें आनेवाले वरुण, इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंके अभिमानी देवताओंका क्या काम रहेगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रुतेः ॥ ४।३।६ ॥ ततः = वहाँसे आगे ब्रह्मलोकतक; वैद्युतेन = विद्युत्-लोकमें प्रकट हुए अमानव पुरुषद्वारा; एव = ही (पहुँचाये जाते हैं); तच्छ्रुतेः = क्योंकि वैसा ही श्रुतिमें कहा है। व्याख्या—वहाँसे उनको वह विद्युत्-लोकमें प्रकट हुआ अमानव पुरुष ब्रह्मके पास पहुँचा देता है, इस प्रकार श्रुतिमें स्पष्ट कहा जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि विद्युत्-लोकसे आगे ब्रह्मलोकतक वही विद्युत्-लोकमें प्रकट अमानव पुरुष उनको पहुँचाता है, बीचके लोकोंके जो अभिमानी देवता हैं, उनका इतना ही काम है कि वे अपने लोकोंमें होकर जानेके लिये उनको मार्ग दे दें और अन्य आवश्यक सहयोग करें। सम्बन्ध—ब्रह्मविद्याका उपासक अधिकारी विद्वान् वहाँ ब्रह्मलोकमें जिसको प्राप्त होता है, वह परब्रह्म है या सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला ब्रह्मा ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया

सूत्र ७-८ ] अध्याय ४ ४४५

सूत्र ७-८ ] अध्याय ४ ४४५ जाता है; यहाँ पहले बादरि आचार्यकी ओरसे सातवें सूत्रसे ग्यारहवें सूत्रतक उसके पक्षकी स्थापना की जाती है— कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ॥ ४ । ३ । ७ ॥ बादरिः=आचार्य बादरिका मत है कि; कार्यम्=कार्यब्रह्मको अर्थात् हिरण्यगर्भको (प्राप्त होते हैं); गत्युपपत्तेः=क्योंकि गमन करनेके कथनकी उपपत्ति; अस्य=इस कार्यब्रह्मके लिये ही (हो सकती है)। व्याख्या—श्रुतिमें जो लोकान्तरमें गमनका कथन है, वह परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये उचित नहीं है; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा तो सभी जगह हैं, उनको पानेके लिये लोकान्तरमें जानेकी क्या आवश्यकता है? अतः यही सिद्ध होता है कि इन ब्रह्मविद्याओंकी उपासना करनेवालोंके लिये जो प्राप्त होनेवाला ब्रह्म है, वह परब्रह्म नहीं; किंतु कार्यब्रह्म ही है; क्योंकि इस कार्यब्रह्मकी प्राप्तिके लिये लोकान्तरमें जाकर उसे प्राप्त करनेका कथन सर्वथा युक्तिसंगत है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे अपने पक्षको दृढ़ करते हैं— विशेषितत्वाच्च ॥ ४ । ३ । ८ ॥ च=तथा; विशेषितत्वात्=विशेषण देकर स्पष्ट कहा गया है; इसलिये भी (कार्यब्रह्मकी प्राप्ति मानना ही उचित है)। व्याख्या—'अमानव पुरुष इनको ब्रह्मलोकोंमें ले जाता है' (बृह० उ० ६ । २ । १५) इस श्रुतिमें ब्रह्मलोकमें बहुवचनका प्रयोग किया गया है तथा ब्रह्मलोकोंमें ले जानेकी बात कही गयी है, ब्रह्मको प्राप्त होनेकी बात नहीं कही गयी, इस प्रकार विशेषरूपसे स्पष्ट कहा जानेके कारण भी यही सिद्ध होता है कि कार्य ब्रह्मको ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह लोकोंका स्वामी है; अतः भोग्यभूमि अनेक होनेके कारण लोकोंके साथ बहुवचनका प्रयोग उचित ही है।

४४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

४४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध— दूसरी श्रुतिमें जो यह कहा है कि वह अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके समीप ले जाता है, वह कथन कार्यब्रह्म माननेसे उपयुक्त नहीं होता; क्योंकि श्रुतिका उद्देश्य यदि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति बताना होता तो ब्रह्माके समीप पहुँचा देता है, ऐसा कथन होना चाहिये था ! इसपर कहते हैं— सामीप्यात्तु तद्व्यपदेशः ॥ ४। ३।९॥ तद्व्यपदेशः = वह कथन; तु = तो; सामीप्यात् = ब्रह्मकी समीपताके कारण ब्रह्माके लिये भी हो सकता है। व्याख्या— 'जो सबसे पहले ब्रह्माको रचता है तथा जो उसको समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, परमात्म-ज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले उस प्रसिद्ध परमदेव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षु साधक शरण ग्रहण करता हूँ।'* (श्वेता० उ० ६।१८) इस श्रुति-कथनके अनुसार ब्रह्मा उस परब्रह्मका पहला कार्य होनेके कारण ब्रह्माको 'ब्रह्म' कहा गया है, ऐसा मानना युक्तिसंगत हो सकता है। सम्बन्ध— गीतामें कहा है कि ब्रह्माके लोकतक सभी लोक पुनरावृत्तिशील हैं (गीता ८।१६)। इस प्रसंगमें ब्रह्माकी आयु पूर्ण हो जानेपर वहाँ जानेवालोंका वापस लौटना अनिवार्य है और श्रुतिमें देवयानमार्गसे जानेवालोंका वापस न लौटना स्पष्ट कहा है; इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति न मानकर परब्रह्मकी प्राप्ति मानना ही उचित मालूम होता है, इसपर बादरिकी ओरसे कहा जाता है— कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात् ॥ ४। ३।१० ॥ कार्यात्यये = कार्यरूप ब्रह्मलोकका नाश होनेपर; तदध्यक्षेण = उसके स्वामी ब्रह्माके; सह=सहित; अतः =इससे; परम् =श्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माको; अभिधानात् = प्राप्त होनेका कथन है, इसलिये (पुनरावृत्ति नहीं होगी)।

  • यह मन्त्र पृष्ठ ९८ में अर्थसहित आ गया है।

सूत्र ११-१२ ] अध्याय ४ ४४७

सूत्र ११-१२ ] अध्याय ४ ४४७ व्याख्या—'जिन्होंने उपनिषदोंके विज्ञानद्वारा उनके अर्थभूत परमात्माका भलीभाँति निश्चय कर लिया है तथा कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक ब्रह्मलोकोंमें जाकर अन्तकालमें परम अमृतस्वरूप होकर भलीभाँति मुक्त हो जाते हैं।'१ (मु० उ० ३।२।६) इस प्रकार श्रुतिमें उन सबकी मुक्तिका कथन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रलयकालमें ब्रह्मलोकका नाश होनेपर उसके स्वामी ब्रह्माके सहित वहाँ गये हुए ब्रह्मविद्याके उपासक भी परब्रह्मको प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं, इसलिये उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे अपने पक्षको पुष्ट करते हैं— स्मृतेश्च ॥ ४।३।११॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—'वे सब शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष प्रलयकाल प्राप्त होनेपर समस्त जगत्के अन्तमें ब्रह्माके साथ उस परमपदमें प्रविष्ट हो जाते हैं।'२ (कू० पु०, पूर्व ख० ११।२८४) इस प्रकार स्मृतिमें भी यही भाव प्रदर्शित किया है, इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—यहाँतक बादरिके पक्षकी स्थापना करके अब उसके उत्तरमें आचार्य जैमिनिका मत उद्धृत करते हैं— परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ॥ ४।३।१२॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनिका कहना है कि; मुख्यत्वात्=ब्रह्मशब्दका मुख्य वाच्यार्थ होनेके कारण; परम्=परब्रह्मको प्राप्त होता है (यही मानना युक्तिसंगत है)। १-यह मन्त्र पृष्ठ ३६० में अर्थसहित आ गया है। २-ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥

४४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

४४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—वह अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके समीप पहुँचा देता है (छा० उ० ५।१०।२) श्रुतिके इस वाक्यमें कहा हुआ 'ब्रह्म' शब्द मुख्यतया परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, इसलिये अर्चि आदि मार्गसे जानेवाले परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते हैं, कार्यब्रह्मको नहीं। जहाँ मुख्य अर्थकी उपयोगिता नहीं हो, वहीं गौण अर्थकी कल्पना की जा सकती है, मुख्य अर्थकी उपयोगिता रहते हुए नहीं। वह परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण होनेपर भी उसके परम धामका प्रतिपादन और वहाँ विद्वान् उपासकोंके जानेका वर्णन श्रुतियों (क० उ० १।३।९), (प्र० उ० १।१०) और स्मृतियोंमें (गीता १५। ६) जगह-जगह किया गया है। इसलिये उसके लोकविशेषमें गमन करनेके लिये कहना कार्यब्रह्मका द्योतक नहीं है। बहुवचनका प्रयोग भी आदरके लिये किया जाना सम्भव है तथा उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके अपने लिये रचे हुए अनेक लोकोंका होना भी कोई असम्भव बात नहीं है। अतः सर्वथा यही सिद्ध होता है कि वे उसीके परमधाममें जाते हैं तथा परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते हैं; कार्यब्रह्मको नहीं। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ४।३।१३॥ दर्शनात् = श्रुतिमें जगह-जगह गतिपूर्वक परब्रह्मकी प्राप्ति दिखायी गयी है, इससे; च=भी (यही सिद्ध होता है कि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं है)। व्याख्या—'उनमेंसे सुषुम्णा नाड़ीद्वारा ऊपर उठकर अमृतत्वको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८।६।६) 'वह संसारमार्गके उस पार उस विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है।' (क० उ० १। ३। ९) इसके सिवा सुषुम्णा नाड़ीद्वारा शरीरसे निकलकर जानेका वर्णन कठोपनिषद्में भी वैसा ही आया है (क० उ० २।३।१६)। इस प्रकार जगह-जगह

सूत्र १४-१५ ] अध्याय ४ ४४९

सूत्र १४-१५ ] अध्याय ४ ४४९

गतिपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति श्रुतिमें प्रदर्शित की गयी है। इससे यही सिद्ध होता है कि देवयानमार्गके द्वारा जानेवाले ब्रह्मविद्याके उपासक परब्रह्मको ही प्राप्त होते हैं, न कि कार्यब्रह्मको। सम्बन्ध— प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते हैं— न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ॥ ४ । ३ । १४ ॥ च=इसके सिवा; प्रतिपत्त्यभिसन्धिः=उन ब्रह्मविद्याके उपासकोंका प्राप्तिविषयक संकल्प भी; कार्ये=कार्यब्रह्मके लिये; न=नहीं है। व्याख्या— इसके सिवा, उन ब्रह्मविद्याके उपासकोंका जो प्राप्तिविषयक संकल्प है, वह कार्यब्रह्मके लिये नहीं है अपितु परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त करनेके लिये उनकी साधनामें प्रवृत्ति देखी गयी है, इसलिये भी उनको कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती, परब्रह्मकी ही प्राप्ति होती है। श्रुतिमें जो यह कहा गया है कि वे प्रजापतिके सभाभवनको प्राप्त होते हैं (छा० उ० ८।१४।१), उस प्रसंगमें भी उपासकका लक्ष्य प्रजापतिके लोकमें रहना नहीं है; किंतु परब्रह्मके परमधाममें जाना ही है; क्योंकि वहाँ जिस यशोंके यश यानी महायशका वर्णन है, वह ब्रह्मका ही नाम है, यह बात अन्यत्र श्रुतिमें कही गयी है (श्वेता० उ० ४।१९) तथा उसके पहले (छा० उ० ८।१३।१)-के प्रसंगसे भी यही सिद्ध हो सकता है कि वहाँ साधकका लक्ष्य परब्रह्म ही है। सम्बन्ध— इस प्रकार बादरिके पक्षकी और उसके उत्तरकी स्थापना करके अब सूत्रकार अपना मत प्रकट करते हुए सिद्धान्तका वर्णन करते हैं— अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथा- दोषात्तत्क्रतुश्च ॥ ४।३।१५॥ अप्रतीकालम्बनान्=वाणी आदि प्रतीकका अवलम्बन करके उपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सब उपासकोंको; नयति=(ये अर्चि आदि

४५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

४५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ देवतालोग देवयानमार्गसे) ले जाते हैं; उभयथा=(अतः) दोनों प्रकारसे; अदोषात्=माननेमें कोई दोष न होनेके कारण; तत्क्रतुः=उनके संकल्पानुसार परब्रह्मको; च=और कार्यब्रह्मको प्राप्त कराना सिद्ध होता है; इति=यह; बादरायणः=व्यासदेव कहते हैं। व्याख्या—आचार्य बादरायण अपना सिद्धान्त बतलाते हुए यह कहते हैं कि जिस प्रकार वाणी आदिमें ब्रह्मकी प्रतीक-उपासनाका वर्णन है, उसी प्रकार दूसरी-दूसरी वैसी उपासनाओंका भी उपनिषदोंमें वर्णन है। उन उपासकोंके सिवा, जो ब्रह्मलोकोंके भोगोंको स्वेच्छानुसार भोगनेकी इच्छावाले कार्यब्रह्मके उपासक हैं और जो परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे उस सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ परमेश्वरकी उपासना करनेवाले हैं उन दोनों प्रकारके उपासकोंको उनकी भावनाके अनुसार कार्यब्रह्मके भोगसम्पन्न लोकोंमें और परब्रह्म परमात्माके परमधाममें दोनों जगह ही वह अमानव पुरुष पहुँचा देता है, इसलिये दोनों प्रकारकी मान्यतामें कोई दोष नहीं है; क्योंकि उपासकका संकल्प ही इस विशेषतामें कारण है। श्रुतिमें भी यह वर्णन स्पष्ट है कि 'जिनको परब्रह्मके परमधाममें पहुँचाते हैं, उनका मार्ग भी प्रजापति ब्रह्माके लोकमें होकर ही है (कौ० उ० १।३)। अतः जिनके अन्तःकरणमें लोकोंमें रमण करनेके संस्कार होते हैं, उनको वहाँ छोड़ देते हैं, जिनके मनमें वैसे भाव नहीं होते, उनको परमधाममें पहुँचा देते हैं; परंतु देवयानमार्गसे गये हुए दोनों प्रकारके ही उपासक वापस नहीं लौटते। सम्बन्ध—प्रतीकोपासनावालोंको अर्चिमार्गसे नहीं ले जानेका क्या कारण है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— विशेषं च दर्शयति ॥ ४।३।१६ ॥ विशेषम्=इसका विशेष कारण; च=भी; दर्शयति=श्रुति दिखाती है। व्याख्या—वाणी आदि प्रतीकोपासनावालोंको देवयानमार्गके अधिकारी

सूत्र १६ ] अध्याय ४ ४५१

सूत्र १६ ] अध्याय ४ ४५१ क्यों नहीं ले जाते, इसका विशेष कारण उन-उन उपासनाओंके विभिन्न फलका वर्णन करते हुए श्रुति स्वयं ही दिखलाती है, वाणीमें प्रतीकोपासनाका फल जहाँतक वाणीकी गति है, वहाँतक इच्छानुसार विचरण करनेकी शक्ति बताया गया है (छा० उ० ७।२।२)। इसी प्रकार दूसरी प्रतीकोपासनाओंका अलग-अलग फल बताया है, सबके फलमें एकता नहीं है। इसलिये वे उपासक देवयानमार्गसे न तो कार्यब्रह्मके लोकमें जानेके अधिकारी हैं और न परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें ही जानेके अधिकारी हैं; अतः उस मार्गके अधिकारी देवताओंका अर्चिमार्गसे उनको न ले जाना उचित ही है। तीसरा पाद सम्पूर्ण