भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

सूत्र २२ ] अध्याय १ ६५ अंगिराने उसके गुण और धर्मोंका वर्णन करते हुए (मु० १ । १ । ६ में) कहा है— 'यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्। नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥' अर्थात् 'जो इन्द्रियोंद्वारा अगोचर है, पकड़नेमें आनेवाला नहीं है, जिसका कोई गोत्र नहीं है, वर्ण नहीं है, जो आँख, कान तथा हाथ-पैरसे रहित है, नित्य, व्यापक, सर्वत्र परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वथा अविनाशी है। उसको धीर पुरुष देखते हैं, वह समस्त भूतोंका परम कारण है।' फिर नवम मन्त्रमें कहा है— 'यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥' 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे यह विराट्रूप समस्त जगत् तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं।' यहाँ जिन सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है, वे परब्रह्म परमेश्वरके ही हैं। तथा एक ब्रह्मको जान लेनेपर ही सब कुछ जाना हुआ हो सकता है, अन्य किसीके जाननेसे नहीं। इसलिये उस प्रकरणमें जिसे अदृश्यता आदि गुणोंवाला बताया गया है वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—इसी बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ १। २ । २२ ॥ विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम् = परमेश्वरसूचक विशेषणोंका कथन होनेसे तथा प्रकृति और जीवात्मासे उसको भिन्न बताये जानेके कारण; च=भी; इतरौ = दूसरे दोनों जीवात्मा और प्रकृति; न = अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्के कारण नहीं कहे जा सकते। व्याख्या—इस प्रकरणमें जिसको अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त और सब भूतोंका कारण बताया गया है, उसके लिये 'सर्वज्ञ' आदि विशेषण दिये