वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ गये हैं, जो न तो प्रधान (जड प्रकृति)-के लिये उपयुक्त हो सकते हैं और न अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोंको ब्रह्मसे भिन्न कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् (३।१।७)-में उल्लेख है कि—'पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥' अर्थात् 'वह देखनेवालोंके शरीरके भीतर यहीं हृदय- गुफामें छिपा हुआ है।' इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता स्वतः स्पष्ट हो जाती है। इसके सिवा, मुण्डक० (३।१।२)-में भी कहा है कि— 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ 'शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमें आसक्त होकर डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है। परंतु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोंद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है।' इस प्रकार इस मन्त्रमें स्पष्ट शब्दोंद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है। अतः यहाँ जीव और प्रकृति दोनोंमेंसे कोई भी अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्-कारण नहीं हो सकता। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें जिसे समस्त भूतोंका कारण बताया गया है, वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, इसकी पुष्टिके लिये दूसरा प्रमाण उपस्थित करते हैं— रूपोपन्यासाच्च ॥ १ । २ । २३ ॥ रूपोपन्यासात् = श्रुतिमें उसीके निखिल लोकमय विराट्स्वरूपका वर्णन किया गया है, इससे; च = भी (वह परमेश्वर ही समस्त भूतोंका कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (२।१।४)-में परब्रह्म परमेश्वरके सर्वलोकमय विराट्स्वरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है— 'अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥'