वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २४ ] अध्याय १ ६७ 'अग्नि इस परमेश्वरका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, सब दिशाएँ दोनों कान हैं और प्रकट हुए वेद उसकी वाणी हैं। वायु इसका प्राण और सम्पूर्ण विश्व हृदय है। इसके पैरोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है। यह समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है।' इस प्रकार परमात्माके विराट्स्वरूपका उल्लेख करके उसे सबका अन्तरात्मा बताया गया है; इसलिये उक्त प्रकरणमें 'भूतयोनि' के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, यह निश्चय होता है। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद् (५ । १८ । २)- में 'वैश्वानर' के स्वरूपका वर्णन करते हुए 'द्युलोक' को उसका मस्तक बताया है। 'वैश्वानर' शब्द जठराग्निका वाचक है। अतः यह वर्णन जठरानलके विषयमें है या अन्य किसीके ? इस शंकाका निवारण करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है- वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ १।२।२४ ॥ वैश्वानरः = (वहाँ) 'वैश्वानर' नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है; साधारणशब्दविशेषात् = क्योंकि उस वर्णनमें 'वैश्वानर' और 'आत्मा' इन साधारण शब्दोंकी अपेक्षा (परब्रह्मके बोधक) विशेष शब्दोंका प्रयोग हुआ है। व्याख्या - छान्दोग्योपनिषद्में पाँचवें अध्यायके ग्यारहवें खण्डसे जो प्रसंग आरम्भ हुआ है, वह इस प्रकार है- 'प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन तथा बुडिल - ये पाँचों ऋषि श्रेष्ठ गृहस्थ और महान् वेदवेत्ता थे। इन्होंने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि 'हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्मका क्या स्वरूप है?' जब वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके तो यह निश्चय किया कि 'इस समय महर्षि उद्दालक वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं, हमलोग उन्हींके पास चलें।' इस निश्चयके अनुसार वे पाँचों ऋषि उद्दालक मुनिके यहाँ गये। उन्हें देखते ही मुनिने अनुमान कर लिया कि 'ये लोग मुझसे कुछ पूछेंगे, किंतु मैं इन्हें पूर्णतया उत्तर नहीं दे सकूँगा। अतः अच्छा हो कि मैं इन्हें पहलेसे ही दूसरा उपदेष्टा बतला दूँ।' यह सोचकर उद्दालकने उनसे कहा- 'आदरणीय