वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ महर्षियो! इस समय केवल राजा अश्वपति ही वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं। आइये, हम सब लोग उनके पास चलें।' यों कहकर उन सबके साथ उद्दालक मुनि वहाँ गये। राजाने उन सबका यथोचित सत्कार किया और दूसरे दिन उनसे यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये प्रार्थना करते हुए उन्हें पर्याप्त धन देनेकी बात कही। इसपर उन महर्षियोंने कहा- 'हमें धन नहीं चाहिये, हम जिस प्रयोजनसे आपके पास आये हैं, वही दीजिये। हमें पता लगा है, आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका हमारे लिये उपदेश करें।' राजाने दूसरे दिन उन्हें अपने पास बुलाया और एक-एकसे क्रमशः पूछा- 'इस विषयमें आपलोग क्या जानते हैं?' उनमेंसे उपमन्युपुत्र प्राचीनशालने उत्तर दिया- 'मैं द्युलोकको आत्मा समझकर उसकी उपासना करता हूँ।' फिर सत्ययज्ञ बोले- 'मैं सूर्यकी उपासना करता हूँ।' इन्द्रद्युम्नने कहा- 'मैं वायुकी उपासना करता हूँ।' जनने अपनेको आकाशका और बुडिलने जलका उपासक बताया। इन सबकी बात सुनकर राजाने कहा- 'आपलोग उस विश्वके आत्मा वैश्वानरकी उपासना तो करते हैं, परंतु उसके एक-एक अंगकी ही उपासना आपके द्वारा होती है, अतः यह सर्वांगपूर्ण नहीं है; क्योंकि- 'तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वस्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥' अर्थात् 'उस इस विश्वके आत्मा वैश्वानरका द्युलोक मस्तक है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश शरीरका मध्यभाग है, जल बस्ति-स्थान है, पृथिवी दोनों चरण है, वेदी वक्षःस्थल है, दर्भ लोम है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है, अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है और आहवनीय अग्नि मुख है।' इस वर्णनसे मालूम होता है कि यहाँ विश्वके आत्मारूप विराट् पुरुषको ही वैश्वानर कहा गया है; क्योंकि इस प्रकरणमें जठराग्नि आदिके वाचक साधारण शब्दोंकी अपेक्षा, परब्रह्मके वाचक विशेष शब्दोंका जगह-जगह प्रयोग हुआ है-