वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २५ ] अध्याय १ ६१ सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं— स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ १ । २ । २५ ॥ स्मर्यमाणम्=स्मृतिमें जो विराट्स्वरूपका वर्णन है, वह; अनुमानम्= मूलभूत श्रुतिके वचनका अनुमान कराता हुआ वैश्वानरके 'परमेश्वर' होनेका निश्चय करानेवाला है; इति स्यात्=इसलिये इस प्रकरणमें वैश्वानर परमात्मा ही है। व्याख्या—महाभारत, शान्तिपर्व (४७।६९)-में कहा है— ‘यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षुर्दिशः श्रोत्रे तस्मै लोकात्मने नमः ॥’ ‘अग्नि जिसका मुख, द्युलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथिवी दोनों चरण, सूर्य नेत्र तथा दिशाएँ कान हैं, उस सर्वलोकस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।' इस प्रकार इस स्मृतिमें परमेश्वरका अखिल विश्वके रूपमें वर्णन आया है। स्मृतिके वचनसे उसकी मूलभूत किसी श्रुतिका होना सिद्ध होता है। उपर्युक्त छान्दोग्य-श्रुतिमें जो वैश्वानरके स्वरूपका वर्णन है, वही पूर्वोक्त स्मृतिवचनका मूल आधार है। अतः यहाँ उस परब्रह्मके विराट्रूपको ही वैश्वानर कहा गया है यह बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है। अतएव जहाँ-जहाँ आत्मा या परमात्माके वर्णनमें 'वैश्वानर' शब्दका प्रयोग आवे, वहाँ उसे परब्रह्मके विराट्स्वरूपका ही वाचक मानना चाहिये, जठरानल या जीवात्माका नहीं। माण्डूक्योपनिषद्में ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन करते समय ब्रह्मका पहला पाद वैश्वानरको बताया है। वहाँ भी वह परमेश्वरके विराट्स्वरूपका ही वाचक है; जठराग्नि या जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शंका उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं—