वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें७० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्ट्युपदेशा- दसम्भवात्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ १ । २ । २६ ॥ चेत् = यदि कहो; शब्दादिभ्यः = शब्दादि हेतुओंसे अर्थात् अन्य श्रुतिमें वैश्वानर शब्द अग्निके अर्थमें विशेषरूपमें प्रयुक्त हुआ है और इस मन्त्रमें गार्हपत्य आदि अग्नियोंको वैश्वानरका अंग बताया गया है, इसलिये; च = तथा; अन्तःप्रतिष्ठानात् = श्रुतिमें वैश्वानरको शरीरके भीतर प्रतिष्ठित कहा गया है, इसलिये भी; न = (यहाँ वैश्वानर शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक) नहीं है; इति न = तो यह कहना ठीक नहीं है; तथा दृष्ट्युपदेशात् = क्योंकि वहाँ वैश्वानरमें ब्रह्मदृष्टि करनेका उपदेश है; असम्भवात् = (इसके सिवा) केवल जठरानलका विराट्रूपमें वर्णन होना सम्भव नहीं है, इसलिये; च = तथा; एनम् = इस वैश्वानरको; पुरुषम् = 'पुरुष' नाम देकर; अपि = भी; अधीयते = पढ़ते हैं (इसलिये उक्त प्रकरणमें वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है)। व्याख्या—यदि कहो कि अन्य श्रुतिमें 'स यो हैतमेवमग्निं वैश्वानरं पुरुषविधं पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितं वेद।' (शतपथब्रा० १० । ६ । १ । ११) अर्थात् 'जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका तथा पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित जानता है।' इस प्रकार वैश्वानर शब्द अग्निके विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ है, तथा जिस श्रुतिपर विचार चल रहा है, इसमें भी गार्हपत्य आदि तीनों अग्नियोंको वैश्वानरका अंग बताया गया है। इसी प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा है कि 'मैं ही वैश्वानररूपसे प्राणियोंके शरीरमें स्थित हो चार प्रकारके अन्नका पाचन करता हूँ' (१५।१४)। इन सब कारणोंसे यहाँ वैश्वानरके नामसे जठराग्निका ही वर्णन है, परमात्माका नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि शतपथब्राह्मणकी श्रुतिमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानेके उद्देश्यसे ही है। यदि ऐसा न होता तो उसको पुरुष नहीं कहा जाता। तथा श्रीमद्भगवद्गीतामें भी जो वैश्वानर अग्निको सब प्राणियोंके शरीरमें स्थित बताया है, वहाँ भी उसमें परमात्मबुद्धि करानेके लिये भगवान्ने अपनी विभूतिके