भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 486 में से

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पृष्ठ 74

सूत्र २७ ] अध्याय १ ७१ रूपमें ही कहा है। इसके सिवा, जिसपर विचार चल रहा है, उस श्रुतिमें समस्त ब्रह्माण्डको 'वैश्वानर' का शरीर बताया है, सिरसे लेकर पैरोंतक उसके अंगोंमें समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है। यह जठराग्निके लिये असम्भव भी है। एवं शतपथब्राह्मणमें तथा यहाँ भी इस वैश्वानरको पुरुषके आकारवाला और पुरुष कहा गया है; जो कि जठराग्निके उपयुक्त नहीं है। इन सब कारणोंसे इस प्रकरणमें कहा हुआ वैश्वानर परब्रह्म परमेश्वर ही है। जठराग्नि या अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध - इस प्रसंगमें पृथक्-पृथक् उपास्यरूपसे आये हुए 'दिव्', 'आदित्य', 'वायु', 'आकाश', 'जल' तथा 'पृथिवी' भी वैश्वानर नहीं हैं; यह सिद्ध करनेके लिये कहते हैं— अत एव न देवता भूतं च ॥ १।२।२७॥ अतः = उपयुक्त कारणोंसे; एव = ही (यह भी सिद्ध होता है कि); देवता = द्यौ, सूर्य आदि लोकोंके अधिष्ठाता देवगण; च = और; भूतम् = आकाश आदि भूतसमुदाय (भी); न = वैश्वानर नहीं हैं। व्याख्या - उक्त प्रकरणमें 'द्यौ', 'सूर्य' आदि लोकोंकी तथा आकाश, वायु आदि भूतसमुदायकी अपने आत्माके रूपमें उपासना करनेका प्रसंग आया है। इसलिये सूत्रकार स्पष्ट कर देते हैं कि पूर्वसूत्रमें बताये हुए कारणोंसे यह भी समझ लेना चाहिये कि उन-उन लोकोंके अभिमानी देवताओं तथा आकाश आदि भूतोंका भी 'वैश्वानर' शब्दसे ग्रहण नहीं है; क्योंकि समस्त ब्रह्माण्डको वैश्वानरका शरीर बताया गया है। यह कथन न तो देवताओंके लिये सम्भव हो सकता है और न भूतोंके लिये ही। इसलिये यही मानना चाहिये कि 'जो विश्वरूप भी है और नर (पुरुष) भी, वह वैश्वानर है।' इस व्युत्पत्तिके अनुसार परब्रह्म परमेश्वरको ही वैश्वानर कहा गया है। सम्बन्ध - पहले २६वें सूत्रमें यह बात बतायी गयी है कि शतपथब्राह्मणके मन्त्रमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानेके उद्देश्यसे है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शालग्राम-

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