वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ
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सूत्र ३२ ] अध्याय १ ७५ सकता; क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है। वह सगुण-निर्गुण, साकार- निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है। यह विश्वास करके साधकको उसके स्मरण और चिन्तनमें लग जाना चाहिये। वह व्यापक भगवान् सभी देशोंमें सर्वदा विद्यमान है। अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिप्त है। इस कारण उसको देशकालातीत मानना भी उचित ही है। अतः सभी आचार्योंकी मान्यता ठीक है। दूसरा पाद सम्पूर्ण अनेक रूपधारी, समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए एक अद्वितीय परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है।'