वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा पाद सम्बन्ध—पहले दो पादोंमें सर्वान्तर्यामी परब्रह्म परमात्माके व्यापक रूपका भलीभाँति प्रतिपादन किया गया। अब उसी परमेश्वरको सबका आधार बतलाते हुए तीसरा पाद आरम्भ करते हैं— द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ १ । ३ । १ ॥ द्युभ्वाद्यायतनम् = (उपनिषदोंमें) जिसको स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार बताया गया है (वह परब्रह्म परमात्मा ही है); स्वशब्दात् = क्योंकि वहाँ उस परमात्माके बोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (२।२।५)-में कहा गया है कि— 'यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥' अर्थात् 'जिसमें स्वर्ग, पृथिवी और उसके बीचका आकाश तथा समस्त प्राणोंके सहित मन गुँथा हुआ है, उसी एक सबके आत्मरूप परमेश्वरको जानो, दूसरी सब बातोंको सर्वथा छोड़ दो। यही अमृतका सेतु है।' इस मन्त्रमें जिस एक आत्माको उपर्युक्त ऊँचे-से-ऊँचे स्वर्ग और नीचे पृथिवी आदि सभी जगत्का आधार बताया है; वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं; क्योंकि इसमें परब्रह्मबोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा हेतु देते हैं— मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । २ ॥ मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् = (उस सर्वाधार परमात्माको) मुक्त पुरुषोंके लिये प्राप्तव्य बतलाया गया है, इसलिये (वह जीवात्मा नहीं हो सकता)। व्याख्या—उक्त उपनिषद्में ही आगे चलकर कहा गया है कि—