भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 486 में से

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पृष्ठ 80

सूत्र २ ] अध्याय १ ७७ 'यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥' (मु० उ० ३।२।८) 'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परमपुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।' इस प्रकार श्रुतिने परमपुरुष परमात्माको मुक्त (ज्ञानी) पुरुषोंके लिये प्राप्तव्य बताया है; इसलिये (मु० उ० २।२।५ में) द्युलोक और पृथिवी आदिके आधाररूपसे जिस 'आत्मा' का वर्णन आया है, वह 'जीवात्मा' नहीं, साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही है। इसके पूर्ववर्ती चौथे मन्त्रमें भी परमात्माको जीवात्माका प्राप्य बताया गया है। वह मन्त्र इस प्रकार है— 'प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥' 'प्रणव तो धनुष है और जीवात्मा बाणके सदृश है। ब्रह्मको उसका लक्ष्य कहते हैं। प्रमादरहित (सतत सावधान) मनुष्यके द्वारा वह लक्ष्य बींधा जानेयोग्य है; इसलिये साधकको उचित है कि उस लक्ष्यको वेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाय—सब बन्धनोंसे मुक्त हो सदा परमेश्वरके चिन्तनमें ही तत्पर रहकर तन्मय हो जाय।' इस प्रकार इस प्रसंगमें जगह-जगह परमात्माको जीवका प्राप्य बताये जानेके कारण पूर्वोक्त श्रुतिमें वर्णित द्युलोक आदिका आधारभूत आत्मा परब्रह्म ही हो सकता है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध—अब यहाँ यह शंका होती है कि पृथिवी आदि सम्पूर्ण भूत- प्रपंच जड प्रकृतिका कार्य है; कार्यका आधार कारण ही होता है; अतः प्रधान (जड प्रकृति-) - को ही सबका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं—

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