भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 486 में से

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पृष्ठ 81

७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नानुमानमतच्छब्दात् ॥ १ । ३ । ३ ॥ अनुमानम् = अनुमान-कल्पित प्रधान; न = द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार नहीं हो सकता; अतच्छब्दात् = क्योंकि उसका प्रतिपादक कोई शब्द (इस प्रकरणमें) नहीं है। व्याख्या—इस प्रकरणमें ऐसा कोई शब्द नहीं प्रयुक्त हुआ है, जो जड प्रकृतिको स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार बताता हो। अतः उसे इनका आधार नहीं माना जा सकता। वह जगत्का कारण नहीं है, यह बात तो पहले ही सिद्ध की जा चुकी है। अतः उसे कारण बताकर इनका आधार माननेकी तो कोई सम्भावना ही नहीं है। सम्बन्ध—प्रकृतिका वाचक शब्द उस प्रकरणमें नहीं है यह तो ठीक है। परंतु जीवात्माका वाचक 'आत्मा' शब्द तो वहाँ है ही, अतः उसीको द्युलोक आदिका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— प्राणभृच्च ॥ १ । ३ । ४ ॥ प्राणभृत् = प्राणधारी जीवात्मा; च = भी; ( न= ) द्युलोक आदिका आधार नहीं हो सकता (क्योंकि उसका वाचक शब्द भी इस प्रकरणमें नहीं है)। व्याख्या—जैसे प्रकृतिका वाचक शब्द इस प्रकरणमें नहीं है, वैसे ही जीवात्माका बोधक शब्द भी नहीं प्रयुक्त हुआ है। 'आत्मा' शब्द अन्यत्र जीवात्माके अर्थमें प्रयुक्त होनेपर भी इस प्रकरणमें वह जीवात्माका वाचक नहीं है; क्योंकि (मु० उ० २।२।७ में) इसके लिये 'आनन्दरूप' और 'अमृत' विशेषण दिये गये हैं; जो कि परब्रह्म परमात्माके ही अनुरूप हैं। इसलिये प्राणधारी जीवात्मा भी द्युलोक आदिका आधार नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—उपर्युक्त अभिप्रायकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण देते हैं— भेदव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ५ ॥ भेदव्यपदेशात् = यहाँ कहे हुए आत्माको जीवात्मासे भिन्न बताये जानेके कारण; ( प्राणभृत् न= ) प्राणधारी जीवात्मा सबका आधार नहीं है।