वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ६-७ ] अध्याय १ ७९ व्याख्या—इसी मन्त्र (मु० उ० २।२।५)-में यह बात कही गयी है कि ‘उस आत्माको जानो।’ अतः ज्ञातव्य आत्मासे उसको जाननेवाला भिन्न होगा ही। इसी प्रकार आगेवाले मन्त्र (मु० उ० ३।१।७)-में उक्त आत्माको द्रष्टा जीवात्माओंकी हृदय-गुफामें छिपा हुआ बताया गया है।* इससे भी ज्ञातव्य आत्माकी भिन्नता सिद्ध होती है; इसलिये इस प्रकरणमें बतलाया हुआ द्युलोक आदिका आधार परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा नहीं। सम्बन्ध— यहाँ जीवात्मा और जड प्रकृति दोनों ही द्युलोक आदिके आधार नहीं हैं, इसमें दूसरा कारण बताते हैं— प्रकरणात् ॥ १ । ३ । ६ ॥ प्रकरणात् = यहाँ परब्रह्म परमात्माका प्रकरण है, इसलिये; ( भी यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और जड प्रकृति द्युलोक आदिके आधार नहीं हैं)। व्याख्या—इस प्रकरणमें आगे-पीछेके सभी मन्त्रोंमें उस परमात्माको सर्वाधार, सबका कारण, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् बताकर उसीको जीवात्माके लिये प्राप्तव्य ब्रह्म कहा है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मा एक-दूसरेसे भिन्न हैं तथा यहाँ बतलाया हुआ स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार वह परब्रह्म ही है; जीव या जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध— इसके सिवा— स्थित्यदनाभ्यां च॥ १ । ३ । ७॥ स्थित्यदनाभ्याम् = एककी शरीरमें साक्षीरूपसे स्थिति और दूसरेके द्वारा सुख-दुःखप्रद विषयका उपभोग बताया गया है, इसलिये; च = भी (जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है)।
- दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम्॥ (मु० ३।१।७)