भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 486 में से

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पृष्ठ 84

सूत्र ८ ] अध्याय १ ८१ सम्प्रसादात्=क्योंकि उसे प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे भी; अधि=ऊपर (बड़ा); उपदेशात्=बताया गया है। व्याख्या—उक्त प्रकरणमें नाम आदिके क्रमसे एककी अपेक्षा दूसरेको बड़ा बताते हुए पंद्रहवें खण्डमें प्राणको सबसे बड़ा बताकर कहा है—'यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वँ समर्पितम्। प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥' (छा० उ० ७।१५।१) अर्थात् 'जैसे अरे रथचक्रकी नाभिके आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार समस्त जगत् प्राणके आश्रित है, प्राण ही प्राणके द्वारा गमन करता है, प्राण ही प्राण देता है, प्राणके लिये देता है, प्राण पिता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है।' इससे यह मालूम होता है कि यहाँ प्राणके नामसे जीवात्माका वर्णन है; क्योंकि सूत्रकारने यहाँ उस प्राणका ही दूसरा नाम 'सम्प्रसाद' रखा है और सम्प्रसाद नाम जीवात्माका है, यह बात इसी उपनिषद् (छा० उ० ८।३।४)-में स्पष्ट कही गयी है। इस प्राणशब्दवाच्य जीवात्माके विषयमें आगे चलकर यह भी कहा है कि 'यह सब कुछ प्राण ही है; इस प्रकार जो चिन्तन करनेवाला, देखनेवाला और जाननेवाला है, वह अतिवादी होता है।' इसलिये यहाँ यह धारणा होनी स्वाभाविक है कि इस प्रकरणमें प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही सबसे बड़ा बताया गया है; क्योंकि इस उपदेशको सुनकर नारदजीने पुनः अपनी ओरसे कोई प्रश्न नहीं उठाया। मानो उन्हें अपने प्रश्नका पूरा उत्तर मिल गया हो। परंतु भगवान् सनत्कुमार तो जानते थे कि इससे आगेकी बात समझाये बिना इसका ज्ञान अधूरा ही रह जायगा, अतः उन्होंने नारदजीके बिना पूछे ही सत्य शब्दसे ब्रह्मका प्रकरण उठाया अर्थात् 'तू' शब्दका प्रयोग करके यह स्पष्ट कर दिया कि 'वास्तविक अतिवादी तो वह है, जो सत्यको जानकर उसके बलपर प्रतिवाद करता है।' इस कथनसे नारदके मनमें सत्यतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके उसे जाननेके साधनरूप विज्ञान, मनन, श्रद्धा, निष्ठा और क्रियाको