भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चरणोंकी वन्दना करते हैं। वे सिद्धेश्वर हैं, सिद्धिविधानके कारण हैं, मृत्युञ्जय हैं तथा काल और यमका भी अन्त करनेवाले हैं। उनका मुख प्रसन्नतासूचक हास्यसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है। वे सम्पूर्ण आश्रितोंको कल्याण तथा अभीष्ट वर प्रदान करनेवाले हैं। सदा शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाले, भवरोगसे रहित, भक्तजनोंके प्रिय तथा भक्तोंके एकमात्र बन्धु हैं।

दूरसे देखनेके पश्चात् निकट जाकर मुनिने भगवान् शूलपाणिको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उस समय मुनिके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। वे तीन तारवाली वीणा बजाते हुए कलहंसके समान मधुर कण्ठसे पुनः श्रीकृष्णका गुणगान करने लगे। ब्रह्माजीके पुत्र और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीन्द्रशिरोमणि नारदको आया देख भगवान् शंकर योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र और महर्षियोंके साथ मुस्कराते हुए सिंहासनसे वेगपूर्वक उठकर खड़े हो गये। फिर उन्होंने मुनिको बड़े वेगसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद तथा आसन आदि दिये। साथ ही उन तपोधनसे आनेका प्रयोजन और कुशल-मङ्गल पूछा। इसके बाद भगवान् शम्भु उत्तम रत्नोंके बने हुए श्रेष्ठ एवं सुन्दर सिंहासनपर अपने प्रमुख पार्षदोंके साथ बैठे। किंतु ब्रह्माजीके पुत्र नारद नहीं बैठे। उन्होंने भक्तिभावसे प्रभुको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। गन्धर्वराजके द्वारा किये गये शुभदायक वेदोक्त स्तोत्रसे स्तुति करके पुनः प्रणाम करनेके अनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञा ले नारदजी उनके वाम-भागमें बैठे। वहीं उन्होंने जगत्की वाञ्छा पूर्ण करनेवाले भगवान् शिवसे अपनी हार्दिक अभिलाषा बतायी। मुनिका वह वचन सुनकर कृपानिधान शंकरने तुरंत प्रतिज्ञापूर्वक कहा—'बहुत अच्छा, तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी।' (अध्याय २५)


ब्राह्मणोंके आह्निक आचार तथा भगवान्‌के पूजनकी विधिका वर्णन

**सौति कहते हैं—**शौनकजी! देवर्षि नारदने भगवान् शंकरसे श्रीहरिके स्तोत्र, कवच, मन्त्र, उत्तम पूजाविधान, ध्यान तथा उनके तत्त्वज्ञानकी याचना की। महेश्वरने उन्हें स्तोत्र, कवच, मन्त्र, ध्यान, पूजाविधि तथा उनके पूर्वजन्म-सम्बन्धी ज्ञानका उपदेश दिया। वह सब कुछ पाकर मुनिश्रेष्ठ नारदका मनोरथ पूर्ण हो गया। उन्होंने अपने शरणागतवत्सल गुरु भगवान् शिवको भक्तिभावसे प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।

**नारदजी बोले—**वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप ब्राह्मणोंके आह्निक आचार (दिनचर्या या नित्य-कर्म)-का वर्णन कीजिये, जिससे प्रतिदिन स्वधर्मपालन हो सके।

**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर रात्रिमें पहने हुए कपड़ेको बदल दे और अपने ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित सूक्ष्म, निर्मल, ग्लानिरहित सहस्रदल-कमलपर विराजमान गुरुदेवका चिन्तन करे। ध्यानमें यह देखे कि ब्रह्मरन्ध्रवर्ती सहस्रदल-कमलपर गुरुजी प्रसन्नतापूर्वक बैठे हैं, मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं, व्याख्याकी मुद्रामें उनका हाथ उठा हुआ है और शिष्यके प्रति उनके हृदयमें बड़ा स्नेह है। मुखपर प्रसन्नता छा रही है। वे शान्त तथा निरन्तर संतुष्ट रहनेवाले हैं और साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं। सदा इसी प्रकार उनका चिन्तन करना चाहिये। इस तरह ध्यान करके मन-ही-मन गुरुकी आराधना करे। तदनन्तर निर्मल, श्वेत, सहस्रदलभूषित, विस्तृत हृदयकमलपर विराजमान इष्टदेवका चिन्तन करे। जिस देवताका जैसा ध्यान और जो रूप बताया गया है, वैसा ही चिन्तन करना चाहिये। गुरुकी आज्ञा ले समयोचित कर्तव्यका पालन करना चाहिये। क्रम यह है कि पहले गुरुका ध्यान करके उन्हें प्रणाम करे। फिर उनकी विधिवत् पूजा करनेके