भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 103

ब्रह्मखण्ड ९३

पश्चात् उनकी आज्ञा ले इष्टदेवका ध्यान एवं पूजन करे। गुरु ही देवताके स्वरूपका दर्शन कराते हैं। वे ही इष्टदेवके मन्त्र, पूजाविधि और जपका उपदेश देते हैं। गुरुने इष्टदेवको देखा है; किंतु इष्टदेवने गुरुको नहीं देखा है। इसलिये गुरु इष्टदेवसे भी बढ़कर हैं। गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु महेश्वरदेव हैं, गुरु आद्या प्रकृति-ईश्वरी (दुर्गा देवी) हैं, गुरु चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य हैं, गुरु ही वायु और वरुण हैं, गुरु ही माता-पिता और सुहृद् हैं तथा गुरु ही परब्रह्म परमात्मा हैं। गुरुसे बढ़कर दूसरा कोई पूजनीय नहीं है। इष्टदेवके रुष्ट होनेपर गुरु शिष्य अथवा साधककी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। परंतु गुरुदेवके रुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता मिलकर भी उस साधककी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हैं। जिसपर गुरु सदा संतुष्ट हैं, उसे पग-पगपर विजय प्राप्त होती है और जिसपर गुरुदेव रुष्ट हैं, उसके लिये सदा सर्वनाशकी ही सम्भावना रहती है। जो मूढ़ भ्रमवश गुरुकी पूजा न करके इष्टदेवका पूजन करता है, वह सैकड़ों ब्रह्महत्याओंके पापका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। सामवेदमें साक्षात् भगवान् श्रीहरिने भी ऐसी बात कही है। इसलिये गुरु इष्टदेवसे भी बढ़कर परम पूजनीय हैं।

मुने! इस प्रकार गुरुदेव तथा इष्टदेवका ध्यान एवं स्तवन करके साधक वेदमें बताये हुए स्थानपर पहुँचकर प्रसन्नतापूर्वक मल और मूत्रका त्याग करे। जल, जलके निकट का स्थान, बिलयुक्त भूमि, प्राणियोंके निवासके निकट, देवालयके समीप, वृक्षकी जड़के पास, मार्ग, हलसे जोती हुई भूमि, खेतीसे भरे हुए खेत, गोशाला, नदी, कन्दराके भीतरका स्थान, फुलवाड़ी, कीचड़युक्त अथवा दलदलकी भूमि, गाँव आदिके भीतरकी भूमि, लोगोंके घरके आसपासका स्थान, मेख या खम्भेके पास, पुल, सरकंडोंके वन, श्मशानभूमि, अग्निके समीप, क्रीडास्थल (खेल-कूदके मैदान), विशाल वन, मचानके नीचेका स्थान, पेड़की छायासे युक्त स्थान, जहाँ भूमिके भीतर प्राणी रहते हों वह स्थान, जहाँ ढेर-के-ढेर पत्ते जमा हों वह भूमि, जहाँ घनी दूब उगी हो अथवा कुश जमे हों वह स्थान, बाँबी, जहाँ वृक्ष लगाये गये हों वहाँकी भूमि तथा जो किसी विशेष कार्यके लिये झाड़-बुहारकर साफ की गयी हो, वह भूमि-इन सबको छोड़कर सूर्यके तापसे रहित स्थानमें गड्ढा खोद उसीमें मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये।

दिनमें उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करे; रातमें पश्चिमकी ओर मुँह करके और संध्याकालमें दक्षिणकी ओर मुँह रखते हुए मलोत्सर्ग तथा मूत्रोत्सर्ग करना उचित है। मौन रहकर, जोर-जोरसे साँस न लेते हुए मलत्याग करे, जिससे उसकी दुर्गन्ध नाकमें न जाय। मलत्यागके पश्चात् उस मलको मिट्टी डालकर ढक दे। तदनन्तर बुद्धिमान् पुरुष गुदा आदि अङ्गोंको शुद्ध करे। पहले ढेले या मिट्टीसे गुदा आदिकी शुद्धि करे। तत्पश्चात् उसे जलसे धोकर शुद्ध करे। मृत्तिकायुक्त जो जल शौचके उपयोगमें आता है, उसका परिमाण सुनो। मूत्रत्यागके पश्चात् लिङ्गमें एक बार मिट्टी लगाये और धोये। फिर बायें हाथमें चार बार मिट्टी लगाकर धोये। तत्पश्चात् दोनों हाथोंमें दो बार मिट्टी लगाकर धोना चाहिये, यह मूत्र-शौच कहा गया। यदि मैथुनके अनन्तर मूत्र-शौच करना हो तो उसमें मिट्टी लगाने और धोनेकी संख्या दुगुनी कर दे अथवा मैथुनके अनन्तरका शौच मूत्र-शौचकी अपेक्षा चौगुना होना चाहिये। मलत्यागके पश्चात् लिङ्गमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार तथा दोनों हाथोंमें सात बार मिट्टी देनी चाहिये। छठे बार मिट्टी लगाकर धोनेसे पैरोंकी शुद्धि होती है। गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये मलत्यागके अनन्तर यही शौच बताया गया है। विधवाओंके लिये इस शौचका परिमाण दुगुना बताया गया है।