भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

ब्रह्मखण्ड

संध्याका परित्याग करके द्विज प्रतिदिन ब्रह्महत्या और आत्महत्याके पापका भागी होता है। जो एकादशीके व्रत और संध्योपासनासे हीन है, वह द्विज शूद्रजातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले पापीकी भाँति एक कल्पतक कालसूत्र नामक नरकमें निवास करता है। प्रातःकालकी संध्योपासना करके श्रेष्ठ साधक गुरु, इष्टदेव, सूर्य, ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, माया, लक्ष्मी और सरस्वतीको प्रणाम करे। तत्पश्चात् गुड़, घी, दर्पण, मधु और सुवर्णका स्पर्श करके समयानुसार स्नान आदि करे। जब पोखरी या बावड़ीमें स्नान करे, तब धर्मात्मा एवं विद्वान् पुरुष पहले उसमेंसे पाँच पिण्ड मिट्टी निकालकर बाहर फेंक दे। नदी, नद, गुफा अथवा तीर्थमें स्नान करना चाहिये। पहले जलमें गोता लगाकर पुनः स्नानके लिये संकल्प करे। वैष्णव महात्माओंका स्नानविषयक संकल्प श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये होता है और गृहस्थोंका वह संकल्प किये हुए पापोंके नाशके उद्देश्यसे होता है। ब्राह्मण संकल्प करके अपने शरीरमें मिट्टी पोते। उस समय निम्नांकित वेद-मन्त्रका पाठ करे। मिट्टी लगानेका उद्देश्य शरीरकी शुद्धि ही है।

शरीरमें मृत्तिका-लेपनका मन्त्र

अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्॥

'वसुन्धरे! तुम्हारे ऊपर अश्व चलते हैं, रथ दौड़ते हैं और भगवान् विष्णुने अपने चरणोंसे तुम्हें आक्रान्त किया है (अथवा अवतारकालमें वे तुम्हारे ऊपर लीलाविहार करते हैं)। मृत्तिकामयी देवि! मैंने जो भी दुष्कर्म किया है, मेरा वह सारा पाप तुम हर लो।'

उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
आरुह्य मम गात्राणि सर्वं पापं प्रमोचय॥
पुण्यं देहि महाभागे स्नानानुज्ञां कुरुष्व माम्।

'सैकड़ों भुजाओंसे सुशोभित वराहरूपधारी श्रीकृष्णने एकार्णवके जलसे तुम्हें ऊपर उठाया है। तुम मेरे अङ्गोंपर आरूढ़ हो समस्त पापोंको दूर कर दो। महाभागे! पुण्य प्रदान करो और मुझे स्नान करनेके लिये आज्ञा दो।'

तपोधन! ऐसा कहकर नाभितक जलमें प्रवेश करे और मन्त्रोच्चारणपूर्वक चार हाथ लम्बा-चौड़ा सुन्दर मण्डल बनाकर उसमें हाथ दे तीर्थोंका आवाहन करे। जो-जो तीर्थ हैं, उन सबका वर्णन कर रहा हूँ।

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥

'हे गङ्गे! यमुने! गोदावरि! सरस्वति! नर्मदे! सिन्धु! और कावेरि! तुम सब लोग इस जलमें निवास करो' (इस प्रकार आवाहन करनेसे सब तीर्थ जलमें आ जाते हैं)। तदनन्तर नलिनी, नन्दिनी, सीता, मालिनी, महापथा, भगवान् विष्णुके पादार्घ्यसे प्रकट हुई त्रिपथगामिनी गङ्गा, पद्मावती, भोगवती, स्वर्णरेखा, कौशिकी, दक्षा, पृथ्वी, सुभगा, विश्वकाया, शिवामृता, विद्याधरी, सुप्रसन्ना, लोकप्रसाधिनी, क्षेमा, वैष्णवी, शान्ता, शान्तिदा, गोमती, सती, सावित्री, तुलसी, दुर्गा, महालक्ष्मी, सरस्वती, श्रीकृष्णप्राणाधिका राधिका, लोपामुद्रा, दिति, रति, अहल्या, अदिति, संज्ञा, स्वधा, स्वाहा, अरुन्धती, शतरूपा तथा देवहूति इत्यादि देवियोंका शुद्ध बुद्धिवाला बुद्धिमान् पुरुष स्मरण करे। इनके स्मरणसे स्नान कर अथवा बिना स्नान किये ही मनुष्य परम पवित्र हो जाता है। इसके बाद विद्वान् पुरुष दोनों भुजाओंके मूलभागमें, ललाटमें, कण्ठदेशमें और वक्षःस्थलमें तिलक लगाये। यदि ललाटमें तिलक न हो तो स्नान, दान, तप, होम, देवयज्ञ तथा पितृयज्ञ—सब कुछ निष्फल हो जाता है। ब्राह्मण स्नानके पश्चात् तिलक करके संध्या और तर्पण करे। फिर भक्तिभावसे देवताओंको नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको जाय। वहाँ यत्नपूर्वक पैर धोकर धुले हुए दो वस्त्र धारण