भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 106
९६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

करे। तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष मन्दिरमें जाय। यह साक्षात् श्रीहरिका ही कथन है। जो स्नान करके पैर धोये बिना ही मन्दिरमें घुस जाता है, उसका स्नान, जप और होम आदि सब नष्ट हो जाता है। जो गृहस्थ पुरुष पानीसे भींगे या तेलसे तर वस्त्र पहनकर घरमें प्रवेश करता है, उसके ऊपर लक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं और उसे अत्यन्त भयंकर शाप देकर उसके घरसे निकल जाती हैं। यदि ब्राह्मण पिण्डलियोंसे ऊपरतक पैरोंको धोता है तो वह जबतक गङ्गाजीका दर्शन न कर ले, तबतक चाण्डाल बना रहता है।

ब्रह्मन्! पवित्र साधक आसनपर बैठकर आचमन करे। फिर संयमपूर्वक रहकर भक्तिभावसे सम्पन्न हो वेदोक्त विधिसे इष्टदेवकी पूजा करे। शालग्राम-शिलामें, मणिमें, मन्त्रमें, प्रतिमामें, जलमें, थलमें, गायकी पीठपर अथवा गुरु एवं ब्राह्मणमें श्रीहरिकी पूजा की जाय तो वह उत्तम मानी जाती है। जो अपने सिरपर शालग्रामका चरणोदक छिड़कता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया और सम्पूर्ण यज्ञोंकी दीक्षा ग्रहण कर ली। जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिभावसे शालग्राम-शिलाका जल (चरणामृत) पान करता है, वह जीवन्मुक्त होता है और अन्तमें श्रीकृष्णधामको जाता है। नारद! जहाँ शालग्राम-शिलाचक्र विद्यमान है, वहाँ निश्चय ही चक्रसहित भगवान् विष्णु तथा सम्पूर्ण तीर्थ विराजमान हैं। वहाँ जो देहधारी जानकर, अनजानमें अथवा भाग्यवश मर जाता है, वह दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित विमानपर बैठकर श्रीहरिके धामको जाता है। कौन ऐसा साधुपुरुष है, जो शालग्राम-शिलाके सिवा और कहीं श्रीहरिका पूजन करेगा; क्योंकि शालग्राम-शिलामें श्रीहरिकी पूजा करनेपर परिपूर्ण फलकी प्राप्ति होती है।

पूजाके आधार (प्रतीक)-का वर्णन किया गया। अब पूजनकी विधि सुनो। श्रीहरिकी पूजा बहुसंख्यक सज्जनोंद्वारा सम्मानित है। अतः शास्त्रके अनुसार उसका वर्णन करता हूँ। कोई-कोई वैष्णव पुरुष श्रीहरिको प्रतिदिन भक्तिभावसे सोलह सुन्दर तथा पवित्र उपचार अर्पित करते हैं। कोई बारह द्रव्योंका उपचार और कोई पाँच वस्तुओंका उपचार चढ़ाते हैं। जिनकी जैसी शक्ति हो, उसके अनुसार पूजन करें। पूजाकी जड़ है—भगवान्‌के प्रति भक्ति। आसन, वस्त्र, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, उत्तम नैवेद्य, गन्ध, माल्य, ललित एवं विलक्षण शय्या, जल, अन्न और ताम्बूल—ये सामान्यतः अर्पित करने योग्य सोलह उपचार हैं। गन्ध, अन्न, शय्या और ताम्बूल—इनको छोड़कर शेष द्रव्य बारह उपचार हैं। पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, पुष्प और नैवेद्य—ये पाँच उपचार हैं। श्रेष्ठतम साधक मूलमन्त्रका उच्चारण करके ये सभी उपचार अर्पित करे। गुरुके उपदेशसे प्राप्त हुआ मूलमन्त्र समस्त कर्मोंमें उत्तम माना गया है। पहले भूतशुद्धि करके फिर प्राणायाम करे। तत्पश्चात् अङ्गन्यास, प्रत्यङ्गन्यास, मन्त्रन्यास तथा वर्णन्यासका सम्पादन करके अर्घ्यपात्र प्रस्तुत करे। पहले त्रिकोणाकार मण्डल बनाकर उसके भीतर भगवान् कूर्म (कच्छप)-की पूजा करे। इसके बाद द्विज शङ्खमें जल भरकर उसे वहीं स्थापित करे। फिर उस जलकी विधिवत् पूजा करके उसमें तीर्थोंका आवाहन करे। तदनन्तर उस जलसे पूजाके सभी उपचारोंका प्रक्षालन करे। इसके बाद फूल लेकर पवित्र साधक योगासनसे बैठे और गुरुके बताये हुए ध्यानके अनुसार अनन्यभावसे भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे। इस तरह ध्यान करके साधक मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए पाद्य आदि सब उपचार बारी-बारीसे आराध्यदेवको अर्पित करे। तन्त्रशास्त्रमें बताये हुए अङ्ग-प्रत्यङ्ग देवताओंके साथ श्रीहरिकी पूजा करे। मूलमन्त्रका यथाशक्ति जप करके इष्टदेवके मन्त्रका विसर्जन करे। फिर भाँति-भाँतिके उपहार निवेदित करके स्तुतिके पश्चात् कवचका पाठ करे।