ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
पत्नी हैं। सम्पूर्ण जगत्में इनकी पूजा होती है। इनके बिना देवता अर्पित की हुई हवि पानेमें असमर्थ हैं। यज्ञकी पत्नीको 'दक्षिणा' कहते हैं। इनका सर्वत्र सम्मान होता है। इनके न रहनेपर विश्वभरके सम्पूर्ण कर्म निष्फल समझे जाते हैं। 'स्वधा' पितरोंकी पत्नी हैं। मुनि, मनु और मानव—सभी इनकी पूजा करते हैं। इनका उच्चारण न करके पितरोंको वस्तु अर्पण की जाय तो वह निष्फल हो जाती है। वायुकी पत्नीका नाम देवी 'स्वस्ति' है। प्रत्येक विश्वमें इनका सत्कार होता है। इनके बिना आदान-प्रदान सभी निष्फल हो जाते हैं। 'पुष्टि' गणेशकी पत्नी हैं। धरातलपर सभी इनको पूजते हैं। इनके बिना पुरुष और स्त्री—सभी क्षीणशक्ति-हीन हो जाते हैं। अनन्तकी पत्नीका नाम 'तुष्टि' है। सब लोग इनकी पूजा एवं वन्दना करते हैं। इनके बिना सम्पूर्ण संसार सम्यक् प्रकारसे कभी संतुष्ट हो ही नहीं सकता। ईशानकी पत्नीका नाम 'सम्पत्ति' है। देवता और मनुष्य—सभी इनका सम्मान करते हैं। इनके न रहनेपर विश्वभरकी जनता दरिद्र कहलाती है। 'धृति' कपिलमुनिकी पत्नी हैं। सब लोग सर्वत्र इनका स्वागत करते हैं। ये न रहें तो जगत्में सम्पूर्ण प्राणी धैर्यसे हाथ धो बैठें। 'क्षमा' यमकी पत्नी हैं; ये साध्वी और सुशीला हैं, सभी इनका सम्मान करते हैं; ये न हों तो सब लोग रुष्ट एवं उन्मत्त हो जायँ। सती-साध्वी 'रति' कामदेवकी पत्नी हैं, ये क्रीड़ाकी अधिष्ठात्री देवी हैं। ये न रहें तो जगत्के सब प्राणी केलि-कौतुकसे शून्य हो जायँ। सती 'मुक्ति' को सत्यकी भार्या कहा गया है। सबसे आदर पानेवाली ये देवी परम लोकप्रिय हैं। इनके बिना जगत् सर्वथा बन्धुता-शून्य हो जाता है। परम साध्वी 'दया' मोहकी पत्नी हैं। ये पूज्य एवं जगत्प्रिय हैं। इनके अभावमें सम्पूर्ण प्राणी सर्वत्र निष्ठुर माने जाते हैं। पुण्यकी सहधर्मिणी 'प्रतिष्ठा' हैं। ये पुण्यरूपा देवी सदा सुपूजित होती हैं। मुने! इनके बिना सारा संसार जीते हुए ही मृतकके समान समझा जाता है। सुकर्मकी पत्नी 'कीर्ति' हैं, जो धन्या और माननीया हैं। सबके द्वारा इनका सम्मान होता है। इनके अभावमें अखिल जगत् यशोहीन होकर मृतकके समान हो जाता है। 'क्रिया' उद्योगकी पत्नी हैं। इन आदरणीया देवीसे सब लोग सहमत हैं। नारद! इनके बिना सारा संसार उच्छिन्न-सा हो जाता है। अधर्मकी पत्नीको 'मिथ्या' कहते हैं। सभी धूर्त इनका सत्कार करते हैं। सत्ययुगमें ये बिलकुल अदृश्य थीं। त्रेतायुगमें सूक्ष्म रूप धारण करके प्रकट हो गयीं। द्वापरमें अपने आधे शरीरसे शोभा पाने लगीं और कलियुगमें तो इन 'मिथ्या' देवीका शरीर पूरा हृष्ट-पुष्ट हो गया है। सब जगह इनकी पहुँच होनेके कारण ये बड़ी प्रगल्भता (धृष्टता)-के साथ सर्वत्र अपना आधिपत्य जमाये रहती हैं। इनके भाईका नाम 'कपट' है। उसके साथ ये प्रत्येक घरमें चक्कर लगाती हैं। 'शान्ति' और 'लज्जा'—ये सुशीलकी दो आदरणीया पत्नियाँ हैं। नारद! इनके न रहनेपर सारा जगत् उन्मत्तकी भाँति जीवन व्यतीत करने लगता है। ज्ञानकी तीन पत्नियाँ हैं—'बुद्धि', 'मेधा' और 'स्मृति'। ये साथ छोड़ दें तो समस्त संसार मूर्ख और मरेके समान हो जाय।
धर्मकी सहधर्मिणीका नाम 'मूर्ति' है। कमनीय कान्तिवाली ये देवी सबके मनको मुग्ध किये रहती हैं। इनका सहयोग न मिले तो परमात्मा निराकार ही रह जायँ और सम्पूर्ण विश्व भी निराधार हो जाय। इनके स्वरूपको अपनाकर ही साध्वी लक्ष्मी सर्वत्र शोभा पाती हैं। 'श्री' और 'मूर्ति'—दोनों इनके स्वरूप हैं। ये परम मान्य, धन्य एवं सुपूज्य हैं। 'कालाग्नि' रुद्रकी पत्नीका नाम है। इनको 'योगनिद्रा' भी कहते हैं। रात्रिमें इनका सहयोग पाकर सम्पूर्ण प्राणी