ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १११ आच्छन्न अर्थात् नींदसे व्याप्त हो जाते हैं। कालकी तीन भार्याएँ हैं- 'संध्या', 'रात्रि' और 'दिन'। ये न रहें तो ब्रह्मा भी काल-संख्याका परिगणन नहीं कर सकते। 'क्षुधा' और 'पिपासा'- ये दो लोभकी भार्याएँ हैं। ये परम धन्य, मान्य और आदरकी पात्र हैं। इन्होंने सम्पूर्ण जगत्पर अपना प्रभाव जमा रखा है। इन्हींके कारण जगत् क्षोभयुक्त तथा चिन्तातुर होता है। 'प्रभा' और 'दाहिका'-ये तेजकी दो स्त्रियाँ हैं। इनके अभावमें जगत्स्रष्टा ब्रह्मा अपना कार्य-सम्पादन करनेमें असमर्थ हैं। ज्वरकी दो प्यारी भार्याएँ हैं-'जरा' और 'मृत्यु'। ये दोनों कालकी पुत्रियाँ हैं। इनकी सत्ता न रहे तो ब्रह्माके बनाये हुए जगत्की व्यवस्था ही बिगड़ जाय। निद्राकी कन्याका नाम 'तन्द्रा' है। यह और 'प्रीति'-ये दो सुखकी प्रियाएँ हैं। ब्रह्मपुत्र नारद ! विधिके विधानमें बना रहनेवाला यह सारा जगत् इनसे व्याप्त है। 'श्रद्धा' और 'भक्ति'-ये वैराग्यकी दो परम आदरणीय पत्नियाँ हैं। मुने! इनके कृपा- प्रसादसे अखिल जगत् सदा जीवन्मुक्त हो सकता है। देवमाता 'अदिति', गौओंको उत्पन्न करनेवाली 'सुरभि', दैत्योंकी माता 'दिति', 'कद्रू', 'विनता' और 'दनु' - ये सभी देवियाँ सृष्टिका कार्य सँभालती हैं। इन्हें भगवती प्रकृतिकी 'कला' कहा जाता है। अन्य भी बहुत-सी कलाएँ हैं। कुछ कलाओंका परिचय कराता हूँ, सुनो। चन्द्रमाकी पत्नी 'रोहिणी' और सूर्यकी 'संज्ञा' हैं। मनुकी भार्याका नाम 'शतरूपा' है। 'शची' इन्द्रकी धर्मपत्नी हैं। बृहस्पतिकी सहधर्मिणी 'तारा' हैं। 'अरुन्धती' वसिष्ठमुनिकी धर्मपत्नी हैं। 'अहल्या' गौतमकी, 'अनसूया' अत्रिकी, 'देवहूति' कर्दममुनिकी और 'प्रसूति' दक्षकी पत्नियाँ हैं। पितरोंकी मानसी कन्या 'मेनका' पार्वतीकी जननी हैं। 'लोपामुद्रा', 'आहूति', कुबेरकी पत्नी, वरुणकी पत्नी, यमकी पत्नी, 'बलिकी भार्या विन्ध्यावली', 'कुन्ती', 'दमयन्ती', 'यशोदा', 'सती देवकी', 'गान्धारी', 'द्रौपदी', 'शैव्या', 'सत्यवान्की पत्नी सावित्री', 'राधाकी जननी वृषभानुप्रिया कलावती', 'मन्दोदरी', 'कौसल्या', 'सुभद्रा', 'कैकेयी', 'रेवती', 'सत्यभामा', 'कालिन्दी', 'लक्ष्मणा', 'जाम्बवती', 'नाग्नजिती', 'मित्रविन्दा', 'रुक्मिणी', 'सीता'-जो स्वयं लक्ष्मी कहलाती हैं। 'व्यासको जन्म देनेवाली महासती योजनगन्धा', 'काली', 'बाणपुत्री उषा' उसकी सखी 'चित्रलेखा', 'प्रभावती', 'भानुमती', 'सती मायावती', 'परशुरामजीकी माता रेणुका', 'हलधर बलरामकी जननी रोहिणी' और 'श्रीकृष्णकी परम साध्वी बहिन दुर्गास्वरूपा एकानंशा' आदि भारतवर्षमें भगवती प्रकृतिकी बहुत-सी कलाएँ विख्यात हैं। जो-जो ग्राम- देवियाँ हैं, वे सभी प्रकृतिकी कलाएँ हैं। प्रत्येक लोकमें जितनी स्त्रियाँ हैं, उन सबको प्रकृतिकी कलाके अंशका अंश समझना चाहिये। इसीलिये स्त्रियोंके अपमानसे प्रकृतिका अपमान माना जाता है। जो पति और पुत्रवाली साध्वी ब्राह्मणीकी वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे पूजा करता है, उसके द्वारा भगवती प्रकृतिकी पूजा सम्पन्न होती है। जिसने ब्राह्मणकी अष्टवर्षा कुमारीका वस्त्र, अलंकार एवं चन्दन आदिसे अर्चन कर लिया, उसके द्वारा भगवती प्रकृति स्वयं पूजित हो गयीं। उत्तम, मध्यम और अधम-सभी स्त्रियाँ भगवती प्रकृतिके अंशसे उत्पन्न हैं। जो श्रेष्ठ आचरणवाली तथा पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, इन्हें प्रकृतिदेवीका सत्त्वांश समझना चाहिये। इनको 'उत्तम' माना जाता है। जिन्हें भोग ही प्रिय है, वे राजस अंशसे प्रकट स्त्रियाँ 'मध्यम' श्रेणीकी कही गयी हैं। वे सुख-भोगमें आसक्त होकर सदा अपने कार्यमें लगी रहती हैं। प्रकृतिदेवीके तामस अंशसे उत्पन्न स्त्रियाँ 'अधम' कहलाती हैं। उनके कुलका कुछ पता नहीं रहता। वे मुखसे दुर्वचन बोलनेवाली, कुलटा, धूर्त,