ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
रहा था। परमात्मस्वरूपा प्रकृति-संज्ञक राधासे उत्पन्न यह महान् विराट् बालक सम्पूर्ण विश्वका आधार है। यही 'महाविष्णु' कहलाता है। इसके प्रत्येक रोमकूपमें जितने विश्व हैं, उन सबकी संख्याका पता लगाना श्रीकृष्णके लिये भी असम्भव है। वे भी उन्हें स्पष्ट बता नहीं सकते। जैसे जगत्के रजःकणको कभी नहीं गिना जा सकता, उसी प्रकार इस शिशुके शरीरमें कितने ब्रह्मा और विष्णु आदि हैं—यह नहीं बताया जा सकता। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव विद्यमान हैं। पातालसे लेकर ब्रह्मलोकतक अनगिनत ब्रह्माण्ड बताये गये हैं। अतः उनकी संख्या कैसे निश्चित की जा सकती है? ऊपर वैकुण्ठलोक है। यह ब्रह्माण्डसे बाहर है। इसके ऊपर पचास करोड़ योजनके विस्तारमें गोलोकधाम है। श्रीकृष्णके समान ही यह लोक भी नित्य और चिन्मय सत्यस्वरूप है। पृथ्वी सात द्वीपोंसे सुशोभित है। सात समुद्र इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उनचास छोटे-छोटे द्वीप हैं। पर्वतों और वनोंकी तो कोई संख्या ही नहीं है। सबसे ऊपर सात स्वर्गलोक हैं। ब्रह्मलोक भी इन्हींमें सम्मिलित है। नीचे सात पाताल हैं। यही ब्रह्माण्डका परिचय है। पृथ्वीसे ऊपर भूर्लोक, उससे परे भुवर्लोक, भुवर्लोकसे परे स्वर्लोक, उससे परे जनलोक, जनलोकसे परे तपोलोक, तपोलोकसे परे सत्यलोक और सत्यलोकसे परे ब्रह्मलोक है। ब्रह्मलोक ऐसा प्रकाशमान है, मानो तपाया हुआ सोना चमक रहा हो। ये सभी कृत्रिम हैं। कुछ तो ब्रह्माण्डके भीतर हैं और कुछ बाहर। नारद! ब्रह्माण्डके नष्ट होनेपर ये सभी नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि पानीके बुलबुलेकी भाँति यह सारा जगत् अनित्य है। गोलोक और वैकुण्ठलोकको नित्य, अविनाशी एवं अकृत्रिम कहा गया है। उस विराट्मय बालकके प्रत्येक रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्ड निश्चितरूपसे विराजमान हैं। एक-एक ब्रह्माण्डमें अलग-अलग ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं। बेटा नारद! देवताओंकी संख्या तीन करोड़ है। ये सर्वत्र व्याप्त हैं। दिशाओंके स्वामी, दिशाओंकी रक्षा करनेवाले तथा ग्रह एवं नक्षत्र—सभी इसमें सम्मिलित हैं। भूमण्डलपर चार प्रकारके वर्ण हैं। नीचे नागलोक है। चर और अचर सभी प्रकारके प्राणी उसपर निवास करते हैं।
नारद! तदनन्तर वह विराट्स्वरूप बालक बार-बार ऊपर दृष्टि दौड़ाने लगा। वह गोलाकार पिण्ड बिलकुल खाली था। दूसरी कोई भी वस्तु वहाँ नहीं थी। उसके मनमें चिन्ता उत्पन्न हो गयी। भूखसे आतुर होकर वह बालक बार-बार रुदन करने लगा। फिर जब उसे ज्ञान हुआ, तब उसने परम पुरुष श्रीकृष्णका ध्यान किया। तब वहीं उसे सनातन ब्रह्मज्योतिके दर्शन प्राप्त हुए। वे ज्योतिर्मय श्रीकृष्ण नवीन मेघके समान श्याम थे। उनके दो भुजाएँ थीं। उन्होंने पीताम्बर पहन रखा था। उनके हाथमें मुरली शोभा पा रही थी। मुखमण्डल मुस्कानसे भरा था। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे कुछ व्यस्त-से जान पड़ते थे। पिता परमेश्वरको देखकर वह बालक संतुष्ट होकर हँस पड़ा। फिर तो वरके अधिदेवता श्रीकृष्णने समयानुसार उसे वर दिया। कहा— 'बेटा! तुम मेरे समान ज्ञानी बन जाओ। भूख और प्यास तुम्हारे पास न आ सके। प्रलयपर्यन्त यह असंख्य ब्रह्माण्ड तुमपर अवलम्बित रहे। तुम निष्कामी, निर्भय और सबके लिये वरदाता बन जाओ। जरा, मृत्यु, रोग और शोक आदि तुम्हें कष्ट न पहुँचा सकें।' यों कहकर भगवान् श्रीकृष्णने उस बालकके कानमें तीन बार षडक्षर महामन्त्रका उच्चारण किया। यह उत्तम मन्त्र वेदका प्रधान अङ्ग है। आदिमें 'ॐ' का स्थान है। बीचमें चतुर्थी भक्तिके साथ 'कृष्ण' ये दो अक्षर हैं। अन्तमें अग्निकी पत्नी 'स्वाहा' सम्मिलित हो जाती है। इस प्रकार 'ॐ कृष्णाय