ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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याज्ञवल्क्यद्वारा भगवती सरस्वतीकी स्तुति
[ ऋषिप्रवर ] भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! सरस्वती देवीका स्तोत्र सुनो, जिससे सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। प्राचीन समयकी बात है—याज्ञवल्क्य नामसे प्रसिद्ध एक महामुनि थे। उन्होंने उसी स्तोत्रसे भगवती सरस्वतीकी स्तुति की थी। जब गुरुके शापसे मुनिकी श्रेष्ठ विद्या नष्ट हो गयी, तब वे अत्यन्त दुःखी होकर लोलार्ककुण्डपर, जो उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाला तीर्थ है, गये। उन्होंने तपस्याके द्वारा सूर्यका प्रत्यक्ष दर्शन पाकर शोकविह्वल हो भगवान् सूर्यका स्तवन तथा बारंबार रोदन किया। तब शक्तिशाली सूर्यने याज्ञवल्क्यको वेद और वेदाङ्गका अध्ययन कराया। साथ ही कहा—‘मुने! तुम स्मरण-शक्ति प्राप्त करनेके लिये भक्तिपूर्वक वाग्देवता भगवती सरस्वतीकी स्तुति करो।’ इस प्रकार कहकर दीनजनोंपर दया करनेवाले सूर्य अन्तर्धान हो गये। तब याज्ञवल्क्य मुनिने स्नान किया और विनयपूर्वक सिर झुकाकर वे भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे।
याज्ञवल्क्य बोले—जगन्माता! मुझपर कृपा करो। मेरा तेज नष्ट हो गया है। गुरुके शापसे मेरी स्मरण-शक्ति खो गयी है। मैं विद्यासे वञ्चित होनेके कारण बहुत दुःखी हूँ। विद्याकी अधिदेवते! तुम मुझे ज्ञान, स्मृति, विद्या, प्रतिष्ठा, कवित्व-शक्ति, शिष्योंको समझानेकी शक्ति तथा ग्रन्थ-रचना करनेकी क्षमता दो। साथ ही मुझे अपना उत्तम एवं सुप्रतिष्ठित शिष्य बना लो। माता! मुझे प्रतिभा तथा सत्पुरुषोंकी सभामें विचार प्रकट करनेकी उत्तम क्षमता दो। दुर्भाग्यवश मेरा जो सम्पूर्ण ज्ञान नष्ट हो गया है, वह मुझे पुनः नवीन रूपमें प्राप्त हो जाय। जिस प्रकार देवता धूल या राखमें छिपे हुए बीजको समयानुसार अङ्कुरित कर देते हैं, वैसे ही तुम भी मेरे लुप्त ज्ञानको पुनः प्रकाशित कर दो। जो ब्रह्मस्वरूपा, परमा, ज्योतिरूपा, सनातनी तथा सम्पूर्ण विद्याओंकी अधिष्ठात्री हैं, उन वाणीदेवीको बार-बार प्रणाम है। जिनके बिना सारा जगत् सदा जीते-जी मरेके समान है तथा जो ज्ञानकी अधिष्ठात्री देवी हैं, उन माता सरस्वतीको बारंबार नमस्कार है। जिनके बिना सारा जगत् सदा गूँगा और पागलके समान हो जायगा तथा जो वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं, उन वाग्देवताको बारंबार नमस्कार है। जिनकी अङ्गकान्ति हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद तथा श्वेतकमलके समान उज्ज्वल है तथा जो वर्णों (अक्षरों)-की अधिष्ठात्री देवी हैं, उन अक्षर-स्वरूपा देवी सरस्वतीको बारंबार नमस्कार है। विसर्ग, बिन्दु एवं मात्रा—इन तीनोंका जो अधिष्ठान है, वह तुम हो; इस प्रकार साधु पुरुष तुम्हारी महिमाका गान करते हैं। तुम्हीं भारती हो। तुम्हें बारंबार नमस्कार है। जिनके बिना सुप्रसिद्ध गणक भी संख्याके परिगणनमें सफलता नहीं प्राप्त कर सकता, उन कालसंख्या-स्वरूपिणी भगवतीको बारंबार नमस्कार है। जो व्याख्यास्वरूपा तथा व्याख्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं; भ्रम और सिद्धान्त दोनों जिनके स्वरूप हैं, उन वाग्देवीको बारंबार नमस्कार है। जो स्मृतिशक्ति, ज्ञानशक्ति और बुद्धिशक्तिस्वरूपा हैं तथा जो प्रतिभा और कल्पनाशक्ति हैं, उन भगवतीको बारंबार प्रणाम है। एक बार सनत्कुमारने जब ब्रह्माजीसे ज्ञान पूछा, तब ब्रह्मा भी जडवत् हो गये। सिद्धान्तकी स्थापना करनेमें समर्थ न हो सके। तब स्वयं परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ पधारे। उन्होंने आते ही कहा—‘प्रजापते! तुम उन्हीं इष्टदेवी