भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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प्रकृतिखण्ड १२७

भगवती सरस्वतीकी स्तुति करो।' देवि! परमप्रभु श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर ब्रह्माने तुम्हारी स्तुति की। तुम्हारे कृपा-प्रसादसे उत्तम सिद्धान्तके विवेचनमें वे सफलीभूत हो गये।

ऐसे ही एक समयकी बात है—पृथ्वीने महाभाग अनन्तसे ज्ञानका रहस्य पूछा, तब शेषजी भी मूकवत् हो गये। सिद्धान्त नहीं बता सके। उनके हृदयमें घबराहट उत्पन्न हो गयी। फिर कश्यपकी आज्ञाके अनुसार उन्होंने सरस्वतीकी स्तुति की। इससे शेषने भ्रमको दूर करनेवाले निर्मल सिद्धान्तकी स्थापनामें सफलता प्राप्त कर ली। जब व्यासने वाल्मीकिसे पुराणसूत्रके विषयमें प्रश्न किया, तब वे भी चुप हो गये। ऐसी स्थितिमें वाल्मीकिने आप जगदम्बाका ही स्मरण किया। आपने उन्हें वर दिया, जिसके प्रभावसे मुनिवर वाल्मीकि सिद्धान्तका प्रतिपादन कर सके। उस समय उन्हें प्रमादको मिटानेवाला निर्मल ज्ञान प्राप्त हो गया था। भगवान् श्रीकृष्णके अंश व्यासजी वाल्मीकि मुनिके मुखसे पुराणसूत्र सुनकर उसका अर्थ कविताके रूपमें स्पष्ट करनेके लिये तुम्हारी ही उपासना और ध्यान करने लगे। उन्होंने पुष्करक्षेत्रमें रहकर सौ वर्षोंतक उपासना की। माता! तब तुमसे वर पाकर व्यासजी कवीश्वर बन गये। उस समय उन्होंने वेदोंका विभाजन तथा पुराणोंकी रचना की। जब देवराज इन्द्रने भगवान् शंकरसे तत्त्वज्ञानके विषयमें प्रश्न किया, तब क्षणभर भगवतीका ध्यान करके वे उन्हें ज्ञानोपदेश करने लगे। फिर इन्द्रने बृहस्पतिसे शब्दशास्त्रके विषयमें पूछा। जगदम्बे! उस समय बृहस्पति पुष्करक्षेत्रमें जाकर देवताओंके वर्षसे एक हजार वर्षतक तुम्हारे ध्यानमें संलग्न रहे। इतने वर्षोंके बाद तुमने उन्हें वर प्रदान किया।

तब वे इन्द्रको शब्दशास्त्र और उसका अर्थ समझा सके। बृहस्पतिने जितने शिष्योंको पढ़ाया और जितने सुप्रसिद्ध मुनि उनसे अध्ययन कर चुके हैं, वे सब-के-सब भगवती सुरेश्वरीका चिन्तन करनेके पश्चात् ही सफलीभूत हुए हैं। माता! वह देवी तुम्हीं हो। मुनीश्वर, मनु और मानव—सभी तुम्हारी पूजा और स्तुति कर चुके हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, देवता और दानवेश्वर प्रभृति—सबने तुम्हारी उपासना की है। जब हजार मुखवाले शेष, पाँच मुखवाले शंकर तथा चार मुखवाले ब्रह्मा तुम्हारा यशोगान करनेमें जडवत् हो गये, तब एक मुखवाला मैं मानव तुम्हारी स्तुति कर ही कैसे सकता हूँ।

नारद! इस प्रकार स्तुति करके मुनिवर याज्ञवल्क्य भगवती सरस्वतीको प्रणाम करने लगे। उस समय भक्तिके कारण उनका कंधा झुक गया था। उनकी आँखोंसे जलकी धाराएँ निरन्तर गिर रही थीं। इतनेमें ज्योतिःस्वरूपा महामायाका उन्हें दर्शन प्राप्त हुआ। देवीने उनसे कहा—'मुने! तुम सुप्रख्यात कवि हो जाओ।' यों कहकर भगवती महामाया वैकुण्ठ पधार गयीं। जो पुरुष याज्ञवल्क्यरचित इस सरस्वतीस्तोत्रको पढ़ता है, उसे कवीन्द्रपदकी प्राप्ति हो जाती है। भाषण करनेमें वह बृहस्पतिकी तुलना