ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १२९
विष्णुपत्नी लक्ष्मी, सरस्वती एवं गङ्गाका परस्पर शापवश भारतवर्षमें पधारना
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! वे भगवती सरस्वती स्वयं वैकुण्ठमें भगवान् श्रीहरिके पास रहती हैं। पारस्परिक कलहके कारण गङ्गाने इन्हें शाप दे दिया था। अतः ये भारतवर्षमें अपनी एक कलासे पधारकर नदीरूपमें प्रकट हुईं। मुने! सरस्वती नदी पुण्य प्रदान करनेवाली, पुण्यरूपा और पुण्यतीर्थ-स्वरूपिणी हैं। पुण्यात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे इनका सेवन करें। इनके तटपर पुण्यवानोंकी ही स्थिति है। ये तपस्वियोंके लिये तपोरूपा हैं और तपस्याका फल भी इनसे कोई अलग वस्तु नहीं है। किये हुए सब पाप लकड़ीके समान हैं। उन्हें जलानेके लिये ये प्रज्वलित अग्निसुरूपा हैं। भूमण्डलपर रहनेवाले जो मानव इनकी महिमा जानते हुए इनके तटपर अपना शरीर त्यागते हैं, उन्हें वैकुण्ठमें स्थान प्राप्त होता है। भगवान् विष्णुके भवनपर वे बहुत दिनोंतक वास करते हैं।
तदनन्तर सरस्वती नदीमें स्नानकी और भी महिमा कहकर नारायणने कहा कि इस प्रकार सरस्वतीकी महिमाका कुछ वर्णन किया गया है। अब पुनः क्या सुनना चाहते हो।
सौति कहते हैं—शौनक! भगवान् नारायणकी बात सुनकर मुनिवर नारदने पुनः तत्काल ही उनसे यह पूछा।
नारदजीने कहा—सत्त्वस्वरूपा तथा सदा पुण्यदायिनी गङ्गाने सर्वपूज्या सरस्वतीदेवीको शाप क्यों दे दिया? इन दोनों तेजस्विनी देवियोंके विवादका कारण अवश्य ही कानोंको सुख देनेवाला होगा। आप इसे बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण बोले—नारद! यह प्राचीन कथा मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो। लक्ष्मी, सरस्वती और गङ्गा—ये तीनों ही भगवान् श्रीहरिकी भार्या हैं। एक बार सरस्वतीको यह संदेह हो गया कि श्रीहरि मेरी अपेक्षा गङ्गासे अधिक प्रेम करते हैं। तब उन्होंने श्रीहरिको कुछ कड़े शब्द कह दिये। फिर वे गङ्गापर क्रोध करके कठोर बर्ताव करने लगीं। तब शान्तस्वरूपा, क्षमामयी लक्ष्मीने उनको रोक दिया। इसपर सरस्वतीने लक्ष्मीको गङ्गाका पक्ष करनेवाली मानकर आवेशमें शाप दे दिया कि 'तुम निश्चय ही वृक्षरूपा और नदीरूपा हो जाओगी।'
लक्ष्मीने सरस्वतीके इस शापको सुन लिया; परंतु स्वयं बदलेमें सरस्वतीको शाप देना तो दूर रहा, उनके मनमें तनिक-सा क्रोध भी उत्पन्न नहीं हुआ। वे वहीं शान्त बैठी रहीं और सरस्वतीके हाथको अपने हाथसे पकड़ लिया। पर गङ्गासे यह नहीं देखा गया। उन्होंने सरस्वतीको शाप दे दिया। कहा—'बहन लक्ष्मी! जो तुम्हें शाप दे चुकी है, वह सरस्वती भी नदीरूपा हो जाय। यह नीचे मर्त्यलोकमें चली जाय, जहाँ सब पापीजन निवास करते हैं।'
नारद! गङ्गाकी यह बात सुनकर सरस्वतीने उन्हें शाप दे दिया कि तुम्हें भी धरातलपर जाना होगा और तुम पापियोंके पापको अङ्गीकार करोगी। इतनेमें भगवान् श्रीहरि वहाँ आ गये। उस समय चार भुजावाले वे प्रभु अपने चार पार्षदोंसे सुशोभित थे। उन्होंने सरस्वतीका हाथ पकड़कर उन्हें अपने समीप प्रेमसे बैठा लिया। तत्पश्चात् वे सर्वज्ञानी श्रीहरि प्राचीन अखिल ज्ञानका रहस्य समझाने लगे। उन दुःखित देवियोंके कलह और शापका मुख्य कारण सुनकर परम प्रभुने समयानुकूल बातें बतायीं।
भगवान् श्रीहरि बोले—लक्ष्मी! शुभे! तुम अपनी कलासे राजा धर्मध्वजके घर पधारो। तुम किसीकी योनिसे उत्पन्न न होकर स्वयं भूमण्डलपर प्रकट हो जाना। वहीं तुम वृक्षरूपसे निवास