ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
करोगी। 'शङ्खचूड़' नामक एक असुर मेरे अंशसे उत्पन्न होगा। तुम उसकी पत्नी बन जाना। तत्पश्चात् निश्चय ही तुम्हें मेरी प्रेयसी भार्या बननेका सौभाग्य प्राप्त होगा। भारतवर्षमें त्रिलोकपावनी 'तुलसी' के नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि होगी। वरानने! अभी-अभी तो तुम भारतीके शापसे भारतमें 'पद्मावती' नामक नदी बनकर पधारो।
तदनन्तर गङ्गासे कहा—'गङ्गे! तुम सरस्वतीके शापवश अपने अंशसे पापियोंका पाप भस्म करनेके लिये विश्वपावनी नदी बनकर भारतवर्षमें जाना। सुकल्पिते! भगीरथकी तपस्यासे तुम्हें वहाँ जाना पड़ेगा। धरातलपर तुमको सब लोग भगवती भागीरथी कहेंगे। समुद्र मेरा अंश है। मेरे आज्ञानुसार तुम उसकी पत्नी होना स्वीकार कर लेना।' इसके बाद सरस्वतीसे कहा—'भारती! तुम गङ्गाका शाप स्वीकार करके अपनी एक कलासे भारतवर्षमें चलो। तुम अपने पूर्ण अंशसे ब्रह्मसदनपर पधारकर उनकी कामिनी बन जाओ; ये गङ्गा अपने पूर्ण अंशसे शिवके स्थानपर चलें।' यहाँ अपने पूर्ण अंशसे केवल लक्ष्मी रह जायँ। कारण, इनका स्वभाव परम शान्त है। ये कभी तनिक-सा क्रोध नहीं करतीं। मुझपर इनकी अटूट श्रद्धा है। ये सत्त्वस्वरूपा हैं। ये महान् साध्वी, अत्यन्त सौभाग्यवती, क्षमामूर्ति, सुन्दर आचरणोंसे सुशोभित तथा निरन्तर धर्मका पालन करती हैं।
इनके एक अंशकी कलाका महत्त्व है कि विश्वभरमें सम्पूर्ण स्त्रियाँ धर्मात्मा, पतिव्रता, शान्तरूपा तथा सुशीला बनकर प्रतिष्ठा प्राप्त करती हैं।
अब भगवान् श्रीहरि स्वयं अपना विचार कहने लगे—अहो! विभिन्न स्वभाववाली तीन स्त्रियों, तीन नौकरों और तीन बान्धवोंका एकत्र रहना वेदकी अनुमतिसे विरुद्ध है। ये एक जगह रहकर कल्याणप्रद नहीं हो सकते। जिन गृहस्थोंके घर स्त्री पुरुषके समान व्यवहार करे और पुरुष स्त्रीके अधीन रहे, उसका जीवन निष्फल समझा जाता है। उसके प्रत्येक पगपर अशुभ है। जिसकी स्त्री मुखदुष्टा, योनिदुष्टा और कलहप्रिया हो, उसके लिये तो जंगल ही घरसे बढ़कर सुखदायी है। कारण, वहाँ उसे जल, स्थल और फल तो मिल ही जाते हैं। ये फल-जल आदि जंगलमें निरन्तर सुलभ रहते हैं, घरपर नहीं मिल सकते। अग्निके पास रहना ठीक है; अथवा हिंसक जन्तुओंके निकट रहनेपर भी सुख मिल सकता है; किंतु दुष्टा स्त्रीके निकट रहनेवाले पुरुषको अवश्य ही महान् क्लेश भोगना पड़ता है। वरानने! पुरुषोंके लिये व्याधिज्वाला अथवा विषज्वालाको ठीक बताया जा सकता है; किंतु दुष्टा स्त्रियोंके मुखकी ज्वाला मृत्युसे भी अधिक कष्टप्रद होती है। स्त्रीके वशमें रहनेवाले पुरुषोंकी शुद्धि शरीरके भस्म हो जानेपर भी हो जाय—यह निश्चित नहीं है। स्त्रीके वशमें रहनेवाला व्यक्ति दिनमें जो कुछ कर्म करता है, उसके फलका वह भागी नहीं हो पाता। इस लोक और परलोकमें—सब जगह उसकी निन्दा होती है। जो यश और कीर्तिसे रहित है, उसे जीते हुए भी मुर्दा समझना चाहिये। एक भार्यावालेको ही चैन नहीं; फिर जिसके अनेक स्त्रियाँ हों, उसके लिये तो सुखकी कल्पना ही असम्भव है। अतएव